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अपनी वास्तविक इच्छाओं को जांचे और परखे

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इच्छा, आकांक्षा मनुष्य की प्रेरणा स्त्रोत है इच्छाएं है तो मनुष्य कर्म की और अग्रसर होता है | इच्छाएं नया जोश नई प्रेरणा का संचार मनुष्य के अंदर करने के साथ-साथ समाज में उसका स्थान भी निश्चित करती है लेकिन जब ये इच्छाएं आकाँक्षायें विकृत हो जाती हैं तो सम्पूर्ण जीवन को अशाँति तथा असन्तोष की आग में जलने के लिए फेंक देती हैं। वर्तमान समय में आज ये ही स्थिति हम समाज में देखते है| आज हम सभी लोगों का जीवन संतोष तथा शाँति से वंचित हो गया है। जीवन संघर्ष इतना बढ़ गया है कि इस पर बैठ कर दो मिनट सोच-विचार करने का समय भी नहीं मिलता। दिन-रात भागते, दौड़ते, सुख-सन्तोष की सम्भावनायें लाने के लिए कोई प्रयत्न अछूता नहीं छोड़ते फिर भी विकल तथा क्षुब्ध ही रहना पड़ रहा है। जीवनभर शांति और सुख के दर्शन ही नहीं होते। जहाँ और जिधर सुख-शाँति के लिए जाते हैं, उधर प्रतिकूल परिणाम ही हाथ आते हैं। आजीवन स्वयं को खपाते रहने, श्रम करते रहने, जीवन-रस सुखाते रहने और दौड़-धूप करते रहने पर भी रिक्तता, खिन्नता तथा सन्ताप की प्राप्ति मनुष्य के लिए निःसन्देह बड़े खेद तथा चिन्ता का विषय है। इसके आधार-भूत कारण की खोज निका…

सच मानिए ‘आप और हम’ कुछ विशेष है

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ये बात तो सब मानते है की भगवान् है हर व्यक्ति की सोच, शारीरिकर मानसिक स्थिति भिन्न बनाई है| हर व्यक्ति आकार प्रकार में दुसरे व्यक्ति से भिन्न है स्वभाव व् गुणों से लेकर हर चीज़ सब मेंअलग-अलग है निराली है क्या अपने कभी भी शांति से बैठकर ये सोचा है की हमारे अंदर क्या चीज़ ऐसी है जो हमको दूसरों से अलग करती है शायद हमने अपने अन्दर यह पता लगाने का प्रयत्न कभी नहीं किया कि वहाँ कोई विचारक, कलाकार, नेता, समाज-सेवक, कोई बड़ा व्यापारी अथवा कोई महान व्यक्ति तो छिपा नहीं बैठा है? हाँ, हमने अवश्य ही इस बात को प्रमाद में लिया है। अन्यथा हम आज इस साधारण स्थिति में न पड़े होते। अवश्य ही अब तक हम समाज, सेवा, कला अथवा वाणिज्य के माध्यम से अपना महत्वपूर्ण स्थान बना कर मानव जीवन को काफी दूर तक सफलता की ओर बढ़ा चुके होते। भला हम अपने भीतर छिपे विशिष्ट व्यक्ति को खोज भी कैसे सकते थे? क्योंकि हमारे घर परिवार ने प्रारम्भ से ही हमे कमाने.खाने और आने वाली पीढ़ियों के लिए जोडने की शिक्षा प्रारम्भ से ही दी है |यह कर्तव्य तो तभी पूरा हो सकता था जब हम उसके लिये कुछ समय देते। एकान्त में जाकर और दुनिया की सामान्य बातों…

दीपावली पर पटाखों का प्रयोग धार्मिक एवं पर्यावरणीक दोनों ही दृष्टि से अनुचित

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मित्रों जब से दिल्ली सरकार ने दिल्ली में दिवाली पर आतिशबाजी करने और पटाखे चलाने पर बैन लगाया है तब से सोशल साइट पर सरकार के खिलाफ एक प्रकार का आन्दोलन सा चल पढ़ा है हमारे बेचारे हिन्दू भाई जानकारी एवं ऐतिहासिक तथ्यों के अभाव में इसे धर्म का अपमान और सनातन संस्कृति के प्रति षड्यंत्र मान रहे है| आप मेरा ये लेख अंत तक ज़रूर पढ़े तब आप को मालुम पढ़ सकेगा की हम कैसे भ्रम में पढ़कर अपनी संस्कृति को नुकसान पहुंचा रहे है, जब की मुद्दा तो कुछ और ही है| वास्तव में हमारे हिन्दू सनातन संस्कृति में दिवाली जैसे पावन अवसर पर आतिशबाजी करने की परम्परा कभी रही ही नही रामचरित्र मानस में भी कहीं नही लिखा की राम जी जब अयोध्या लौट कर आये तो अयोध्यावासियों ने आतिशबाजी की या पटाखे चलाकर और पर्यावरण को दूषित प्रदूषित कर श्री राम का स्वागत किया | उस समय चूँकि श्री राम की वापसी के कारण लोगों में उत्साह था और हर व्यक्ति श्री राम के प्रति अपने स्नेह और भक्ति को प्रकट करना चाहता था इसलिए उन्होंने श्री राम के अयोध्या आगमन पर दीपमालिका सजाकर उनका स्वागत किया क्योंकि श्री राम अमावस की काली रात में अयोध्या लौटे तो उनके दर्…

पैसा बहुत कुछ है लेकिन सब कुछ नही

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वर्तमान मनुष्य पैसे के लिए पागल हुआ घूम रहा है| जिसे देखो अधिक से अधिक पैसा कमाकर अमीर बनने और अपने जीवन को अधिक सुविधायुक्त बनाने की धमाल चौकड़ी में लगा हुआ है |ये प्रवृत्ति आज के युवाओं की मानसिकता का एक हिस्सा है और हो भी क्यों न क्योंकि हम उन्हें बचपन से ही ये सिखाते है बेटा अच्छा पड़ेगा तो अच्छी नौकरी लगेगी ,अच्छी नौकरी लगेगी तो अच्छा पैसा मिलेगा, अच्छा पैसा मिलेगा तो जीवन में अच्छी सुविधाएं आएँगी, बस फिर तो लाइफ सेट है| ये पाठ आज के हर माता पिता अपने बच्चे को पढ़ाने में लगे है | माता-पिता वो सब काम अपने बच्चों से करवाना चाहते है जिन्हें करने में वे स्वयं असफल रहे है | महाभारत की एक घटना याद आती है |एक दिन धृतराष्ट बहुत दुखी बैठा था क्योंकि दुर्योधन ने भरी सभा में साफ़ कह दिया था की वो सुई की नोक के बराबर की भूमि भी पांडवों को नही देगा तब विदुर ने धृतराष्ट से पूछा भैया पांडव और कौरव एक ही वंश के है ,उनके गुरु भी एक ही है जिनसे उन्होंने शिक्षा पायी है और हम भरतवंशियों ने उनमे बिना भेदभाव किये दोनो को ही समान स्नेह और प्रेम दिया है फिर भी पांडव इतने विनम्र और सदाचारी जबकि दुर्योधन इतना…

नारी एक कल्पवृक्ष

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प्रेम नारी का जीवन है |अपनी इस निधि को वो आदिकाल से पुरुष पर बिना किसी स्वार्थ के पूर्ण समर्पण और इमानदारी के साथ निछावर करती आई है |कभी न रुकने वाले इस निस्वार्थ प्रेम रुपी निर्झर ने पुरुष को शांति और शीतलता दी है | स्त्री को एक कल्पवृक्ष के रूप में भी देखा जा सकता है जिसके सानिध्य में बैठने पर न केवल  पुरुष  को आत्म तृप्ति मिलती है अपितु उसका पूरा परिवार संतुष्टि प्राप्त करता है  | कई दिनों पहले एक महापुरुष की वाणी सुनने का सौभाग्य मिला उन्होंने एक इतना सुंदर विचार दिया जिसकी मौलिकता जिसकी सत्यता ने मुझे ये लेख लिखने के लिए प्रोत्साहित किया | वो महापुरुष बता रहे थे की यदि सारे संसार से केवल स्त्रीयों को हटा दिया जाए तो इस समूचे ब्रह्माण्ड  का विनाश निश्चित है क्योंकि स्त्री के अभाव में तो सृष्टि आगे चल ही नही सकती शक्ति के अभाव में शिव  भी शव समान हो जाते है |बात सोलह आने सच भी है स्त्री ही परिवार और समाज की निर्मात्री है वो ही वंश परम्परा को आगे बढ़ती है| लेकिन उनकी बात यहाँ पर ही समाप्त नही हुई उनहोंने आगे बोला की यदि इस समूचे ब्रह्माण्ड से पुरुष जाति को समाप्त कर दिया जाए तब भी स…

तपस्या और प्रेम की साकार प्रतिमा है “नारी”

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नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नभ पग तल में।
पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में॥

प्राचीन समय से स्त्रियों के नाम के साथ देवी शब्द का प्रयोग होता चला आ रहा है जैसे लक्ष्मी देवी, सरस्वती देवी, दुर्गा देवी आदि नारी के साथ जुड़ने वाले इस शब्द का प्रयोग आकस्मिक रूप में नही हुआ है अपितु ये नारी की दीर्घकालीन तपस्या का ही फल है | वास्तव में पुरुष में ऊर्जा का संचार करने वाली पथप्रदर्शिका को देवी कहा जाता है| आज की नारी भी अपने अंदर वो अतीत के देवीय गुण संजोय हुए है जिन्होंने समाज के समग्र विकास में योगदान दिया है | कहा जाता है पुरुष के जीवन में माँ के बाद नारी का दूसरा महत्वपूर्ण किरदार पत्नी का होता है| उसके इस रूप को सबसे विश्वास पात्र मित्र की संज्ञा दी जाती है| जीवन के कठिन क्षणों में जब सब नाते रिश्तेदार हमसे किनारा कर लेते है हमे अकेला छोड़ देते है धन संपत्ति का विनाश हो चूका होता है शरीर को रोगों ने जकड़ लिया होता है हम मानसिक अवसाद से ग्रस्त होते है, उपेक्षा जनित एक प्रकार की खीज और चिढ़चिढ़ापन हमारे अंदर आ गया होता है| उस स्थिति में केवल पत्नी ही होती है जो पुरुष को हिम्…

‘कन्याभ्रूण ‘आखिर ये हत्याएं क्यों ?

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बेटा वंश की बेल को आगे बढ़ाएगा,मेराअंतिम संस्कार कर बुढ़ापे में मेरी सेवा करेगा| यहाँ तक की मृत्यु उपरान्त मेरा श्राद्ध करेगा जिससे मुझे शांति और मोक्ष की प्राप्ति होगी और बेटी, बेटी तो क्या है पराया कूड़ा है जिसे पालते पोसते रहो उसके दहेज की व्यवस्था के लिए अपने को खपाते रहो और अंत में मिलता क्या है ? वो पराये घर चली जाती है| यदि गुणवान है तो ससुराल के साथ निभा लेती है, अन्यथा बुढ़ापे में उसके ससुराल वालों की गालियाँ सुनने को ही मिलती है और कहीं घर छोड़ कर आ गयी तो मरने तक उसे खिलाओ और इसी चिंता में मर जाओ की हमारे बाद उसका क्या होगा | ये मानसिकता प्रबल रूप से काम करती है आज के समय में कन्याभ्रूण हत्या के पीछे लड़के या लड़की का पैदा होना स्वयं उसके हाथ में तो नही होता और कौन ऐसा होगा जो ये चाहे की उसके उपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पढ़े तो ऐसे में हम लड़की को समस्याओं परेशानियों का पुलिंदा और लडकों को कुल का दीपक  क्यों समझते है? ये बात मैं केवल अशिक्षित और गाँव देहात के लोगों के लिए नही कह रहा हूँ बल्कि ये ही हालात पढ़े लिखे समाज में हाई सोसायटी के माने जाने वाले लोगों के भी है | आखिर क्यों? क्या अपर…

तीन तलाक का खेल ख़त्म हुआ

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मुस्लिम वर्ग की महिलाओं के लिए आज सोने का सूरज उगा है ये तारीख और ये फैसला इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा |क्योंकि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ का उद्घोष करने वाले इस भारत देश में अब हमारी मुस्लिम बहनों को भी आज समाज में बराबरी का दर्जा मिला है | सुप्रीम कौर्ट के तीन तलाकपर आये फैसले के द्वारा अब हमारा देश मुस्लिम वर्ग की महिलाओं के गौरव, गरिमा और अस्मिता की रक्षा करने में समर्थ हुआ है साथ ही अब सरकार को संविधान और मुस्लिम पर्सोनल लॉ के अनुसार हिन्दू मेरिज एक्ट की तरह मुस्लिम मेरिज एक्ट भी बनाना चाहिए जिसमे विवाह की उम्र, औरतों के अधिकार और विकट परिस्थितियों में तलाक लेने का प्रावधान हो जिससे की मुस्लिम औरतों का जीवन भी अधिक सुरक्षित हो सके | ये एतिहासिक फैसला उन लोगों के मुंह पर करारा तमाचा है जो हिन्दू और मुसलमानों के बीच वैमनस्य बढाने के लिए  ये कहते फिरते है की मुसलमानों के साथ भेदभाव हो रहा है | यदि सरकार के मन में भेदभाव होता तो सरकार मुसलमान औरतों के तीन तलाक के कारण उनके उजड़ते परिवार, समाज और उनके बच्चो की ज़िन्दगी के बारे में नही सोचती मुस्लिम महिलाओं …

तकनीकी के अग्रदूत राजीव गांधी का शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण

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हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री राजीव गांधी का कहना था कि देश के प्रत्येक व्यक्ति तक शिक्षा का प्रसार होना चाहिए| यदि प्रत्येक नागरिक शिक्षित होगा तो एक श्रेष्ठ राष्ट्र का निर्माण होगा| श्री गांधी हमारे देश में तकनीक लाने वाले पहले व्यक्ति थे जिन्होंने न केवल भारतीय जनता को तकनीकी से रूबरू कराया अपितु तकनीकी के द्वारा एक नये राष्ट्र की कल्पना की जिसका जीता जागता स्वरूप हम वर्तमान समय में देख रहे है| आज हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में तकनीकी से जुड़ा हुआ है | राजीव गांधी की मान्यता थी कि शिक्षित जनता ही श्रेष्ठ प्रतिनिधियों को निर्वाचित कर सकती है। देश की समस्याओं का सुन्दर ज्ञान रख सकती है और शिक्षित जनता ही देश के कार्यों में बुद्धिमतापूर्ण तथा सक्रिय योगदान दे सकती है। कोई भी लोकतंत्र अपने मतदाताओं की सामान्य बुद्धि एवं शिक्षा के स्तर को बढ़ाए बिना ऊंचा नहीं उठ सकता। इसलिए नागरिकों के शिक्षा के स्तर को ऊंचा करने से ही उत्कृष्ट लोकतंत्र का जन्म हो सकता है।अशिक्षित जनता लोकतंत्र की घातक शत्रु होती है, अशिक्षित जनता के कारण लोकतंत्र प्रायः निरंकुशतंत्र अथवा भीड़ तंत्र में परिवर…