27 Apr 2020

आरक्षण...एक अभिशप्त व्यवस्था

आज वर्तमान भारत एक भीषण रोग से ग्रसित है और इस महारोग का नाम है “आरक्षण “आज समाज में आरक्षण पाने की ऐसी भीषण आंधी चल पड़ी जिसने योग्यता रूपी वटवृक्ष की जड़ों को मूल से हिला दिया है । ये आंधी समूचे जन मानस को झकझोर रही है, आज हर जाति के व्यक्ति के सुर बदले हुए है हर व्यक्ति आरक्षण रूपी बैसाखियों के सहारे मंजिल तक पहुँचना चाहता है । आज परिस्थितियाँ ऐसी है की समाज को अपनी योग्यताओं पर तनिक भी विश्वास नहीं रहा है । कुछ विशेष सुविधाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए समाज को देश को चाहे कितना भी त्रास झेलना पड़े व्यक्ति उसकी परवाह किये बिना केवल और केवल आरक्षण प्राप्त करना चाहता है। अपने थोड़े से व्यक्तिगत लाभ को प्राप्त करने की अंधी दौड़ में लगे हुए व्यक्ति की सोच ये हो गई है की उसे लाभ होना चाहिए  चाहे उस लाभ को प्राप्त करने में उसे किसी भी अन्य व्यक्ति अथवा समाज को नुकसान ही क्यों न पहुँचाना पड़े।
क्या व्यक्ति की योग्यता का कोई महत्व नहीं रह गया है ? संविधान ने ये सुविधा केवल उन लोगों के लिए और कुछ समय के लिए प्रारम्भ की थी जो समाज में पिछड़ गये थे और जिनका सामाजिक स्तर तेज़ गति से सुधारना आवश्यक था । लेकिन ऐसा हुआ नहीं आज भी गरीब व्यक्ति की स्थिति आज़ादी के 64 वर्षों बाद भी ज्यों की त्यों बनी हुई है ; आरक्षण तो छोडिये आज भी एक औसत व्यक्ति से  संविधान द्वारा प्रदत्त उसके अधिकारों के बारे में पूछेंगे तो व्यक्ति अपने अधिकार नहीं बता पायेगा तो प्रश्न उठता है की ये आरक्षण की आग लगाई किसने ये निश्चित रूप से समाज के वो ठेकेदार है जो आरक्षण की मलाई खाने के लिए प्रदर्शन कर ना केवल शासन  की व्यवस्थाओं को बिगाड़ रहे है बल्कि अपनी जाति के गौरव को भी लज्जित कर रहे है।  ये केवल दया के पात्र हो सकते है सम्मान के नहीं ।
वर्तमान समय में हर क्षेत्र में आरक्षण विद्यमान है कलक्टर, चिकित्सक, इंजीनियर, अध्यापक लगभग सभी क्षेत्रों में आरक्षण का विष घुला हुआ है । यदि आप किसी भी सरकारी नौकरी में जाना चाहते है तो आपको आरक्षण रुपी समस्या से दो चार होना पड़ता है आपको आरक्षण के समीकरण को समझाना होता है क्योंकि सवाल यहाँ आपकी योग्यता का नहीं है बल्कि आरक्षण रुपी दानव की संतुष्टि का है  जहां योग्यता को पूर्णरूप से अनदेखा किया जा रहा है।
क्या आप लोगों को ऐसा नहीं लगता की आरक्षण यदि दिया भी जा रहा है तो कम से कम उन महत्वपूर्ण क्षेत्रों को आरक्षण मुक्त रखना चाहिए जो समाज की नींव का निर्माण कर रहे है । एक अद्यापक जो राष्ट्र का निर्माण करने में अपना विशेष योगदान रखता है उसका चयन आरक्षण नहीं बल्कि योग्यता के आधार पर होना चाहिए एक चिकित्सक जिसके हाथों में जीवन मृत्यु का वास है उस चिकित्सक का चयन  आरक्षण के आधार पर नहीं अपितु योग्यता के आधार पर होना चाहिए।
लेकिन नहीं वर्तमान परिस्थितियाँ इसके विपरीत है एक सामान्य श्रेणी का युवा  उम्मीदवार केवल इस लिए पिछड़ जाता है क्योकि उसकी योग्यताओं को आरक्षण रुपी सर्प ने डंस कर विषैला कर दिया है और ऐसी विषैली मानसिकता वाला युवक समाज में विष का प्रवाह ही कर सकता है; जिसे हम समाज में कई अन्य समस्याओं के रूप में देखते है। ऐसी परिस्थियियाँ युवाओं में चिढ़चिढ़ाहट और सामाजिक व्यवस्थाओं के  प्रति असंतोष पैदा करता है। जो उसके समूचे व्यक्तित्व और सोच को बदल कर रख देता है ।    
ये कैसी विडम्बना है इस देश की जहां योग्यता रुपी पांचाली सुबक है और आरक्षण रुपी दुशासन उसका चिर हरण कर रहा है । इतिहास की इस घटना के परिणाम से सभी लोग परिचित है तो क्या हमारा देश और समाज एक और युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार कर रहा है ? ये ज्वलंत प्रश्न हर समाज के व्यक्ति को अपने अंतर से पूछना चाहिए । क्या हमारी राज व्यवस्था इतनी कमजोर है की इसका विरोध नहीं कर सकती क्या ऐसा नहीं लगता की हमारा राजतन्त्र भी “आरक्षण नीति” पर गंभीरता से विचार ना करके हमारे बीच जातिगत वैमनस्य को बढ़ावा दे रहा है । कुछ लोगों द्वारा प्रदर्शन करना और फिर सरकार का मान जाना या तो थोड़े आश्वासन देकर समस्या को कुछ समय के लिए टाल देना क्या यही इन समस्याओं का समाधान है? इसके परिणाम स्वरुप समाज में असंतोष और अलगाव का जन्म होता है । क्या इसका दोष हमारी अक्षम राज व्यवस्था को नहीं जाता । मैं केवल युवा वर्ग से ही आग्रह करना चाहता हूँ; की वो अपनी योग्यता पर विश्वास करें और अनावश्यक दया के पात्र न बने मेरे युवा मित्रों आप में अनंत योग्यताएं है उन्हें विकसित करें क्योंकि आप ही इस समस्या से देश को बचा सकते है।
आज से हम ये संकल्प करें की हम अपने देश में अपने समाज में आरक्षण रुपी दानव को हावी नहीं होने देंगे और अपनी मेहनत से अपनी योग्यता को सिद्ध करेंगे तो निश्चित रूप से आये दिन होने वाली हड़तालों और प्रदर्शनों से मुक्त देश का निर्माण कर सकेंगे।
                                                                                                       सर्वाधिकार सुरक्षित









मातृ देवो भव:

अखिल ब्रह्मांड नायक भगवान को जब धरती पर अवतरण लेना होता है तब उसे एक माँ की आवश्यकता होती है । जो उसे 9 महीने तक गर्भ में पाले अपने प्यार और स्नेह से सींचें । माँ के अवलंबन के बिना तो स्वयं भगवान अधूरा है अर्थात माँ के बिना समूचे संसार की कल्पना तक नहीं की जा सकती । माँ के अंदर व्याप्त ब्रह्मा का अंश उसे सृष्टि निर्माण की शक्ति प्रदान करता है। माँ में उपस्थित विष्णु का अंश शिशु को प्यार और ममता से पलता पोसता है उसे एक योग्य व्यक्ति बनता है , और माँ में व्याप्त शिव तत्व बालक में उत्पन्न हुई बुराइयों का दृढ़ता से संहार करता है । इस समूची सृष्टि का मूल बीज माँ ही है।
माँ का भारतीय संस्कृति में सदा से सबसे ऊंचा स्थान रहा है । यह सच है की माँ के लिए अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए समस्त जीवन ही कम है पर ये दिन शायद इसी लिए बनाये जाते हैं कि इस दिन हम सामूहिक रूप से भावनाओं का प्रदर्शन कर सकें और माँ की निस्वार्थ सेवा ,प्रेम और ममता के लिए उसे खुले भाव से नमन कर सकें।
जब हम जिन्दगी की आपाधापी से थक जाते हैं तो उसका वात्सल्य से भरा स्पर्श हमारी सभी दुख तकलीफों को दूर कर देता। ईश्वर की सृष्टि में, माँ में ही ईश्वर का वास है जिसे हम सब दुख एवं तकलीफ में सबसे पहले आवाज देते हैं क्योंकि माँ से तो हमारा रिश्ता आज से नहीं है बल्कि दुनिया में आने के पहले से ही होता है। माँ प्यार और डाँट से जीवन को खुशहाल बनाती है । हमारे भले के लिये कभी-कभी सख्त भी हो जाती है लेकिन उस सख्ती में भी हमारे लिए प्रेम और चिंता होती है। अपने सुख-दुख का ख्याल न रखकर बच्चे को बेहतर इंसान बनाने में प्रयत्नशील रहती है।
ईश्वर की सभी सजीव रचना जैसे, पशु एवं पक्षी में भी माँ के वात्सल्य का रूप विद्यमान है। एक चिड़िया एक-एक दाना लाकर अपने बच्चे को खिलाती है और उनको पालती है। इसी प्रकार हमारा सम्पूर्ण विकास माँ की छत्रछाया में ही पल्लवित होता है। माँ अपने दिये संस्कारों के रूप में हमेशा हमारे पास रहती है ।
माँ अपने खाने-पीने का वक़्त भूलकर, भूखी रहकर, बच्चे को दूध पिलाना कभी नहीं भूलती . हर रोज़ बच्चे में नया परिवर्तन व विकास देख कर खुश हुआ करती है। माँ बच्चे कि पहली शिक्षिका होती है. वह माँ ही है जो बच्चे को बोलना, चलना, खाना, पढ़ना सिखाती है. इसके साथ-साथ जीवन के मूल्यों को समझती है, सदाचार सिखाती है. जीवन में एक अच्छा व्यक्ति बनने की सभी सामग्रियाँ बच्चे में डालने कि कोशिश करती है । हर माँ अपने सामर्थ्य से बच्चे के लिए ज्यादा ही करती है. चाहे वह माँ अशिक्षित, गरीब या अपाहिज ही क्यों न हो ।
माँ की ममता वो नींव का पत्थर होती है जिस पर एक बच्चे के भविष्य की इमारत खड़ी होती है। मेरी कल्पना में घर-परिवार एक बगीचा है, “माँ” उस बगीचे की माली (बागवान) है, और उसकी संतान  उस बगीचे के रंग-बिरंगे फूल है । जिस तरह माली अपने बगीचे के एक-एक फूल के सामान भाव से देखता है और उनका लालन-पालन करता है, ठीक उसी तरह “माँ” भी अपने सभी बच्चों का सामान भाव -दृष्टि से लालन-पालन करके, अपना प्यार व् ममता लुटाती है, सृष्टि के अनमोल वरदान को हर पल मेरा शत्-शत् नमन।

                                                                                                 सर्वाधिकार सुरक्षित














पतंगे

  ‘ ज़िंदगी क्या है खुद ही समझ जाओगे , बारिशों में पतंगे उड़ाया करो। ’ ये शेर आज की परिस्थितियों में बिलकुल माकूल बैठता है ये ज़िंदगी हमें ख...