3 May 2020

देवर्षि नारद जयंती (विशेष लेख)

देवर्षि नारद भगवान के जितने प्रेमी भक्त हैं, भगवान भी नारद जी के उतने ही बड़े भक्त हैं ।लेकिन आज की पीढ़ी नारद जी का जिस तरह से चरित्र-चित्रण करती है, उससे उनकी छवि उपहास के पात्र और चुगलखोर की बन गई है जो अतिनिंदनीय है । आज आवश्यकता है कि देवर्षि नारद का वास्तवित चरित्र समाज के सामने आए। प्राणिमात्र के कल्याण की भावना रखने वाले नारदजी ईश्वरीय मार्ग पर अग्रसर होने की इच्छा रखने वाले प्राणियों को सहयोग देते रहते हैं । उन्होंने कितने प्राणियों को किस प्रकार भगवान के पावन चरणों में पहुँचा दिया, इसकी गणना संभव नहीं है । वे सदा भक्तों, जिज्ञासुओं के मार्गदर्शन में लगे रहते हैं ।

वे तीनों लोकों में घटने वाली प्रिय-अप्रिय घटनाओं की जानकारी भगवान तक पहुँचाते हैं । वे देवताओं के साथ-साथ दानवों का मार्गदर्शन भी करते हैं ।नारद जी के विषय में शोध करते हुए उनके जन्म से संबन्धित dवैसे तो अनेक प्रकार की कथाएँ पढ़ने को मिली लेकिन उनमें से एक कथा जो मुझे सबसे अधिक प्रिय और प्रामाणिक मिली वह ये है कि नारद जी का जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के यहाँ हुआ । माँ बहुत गरीब थी और जहां जो काम मिल उसे करके अपना व अपने पुत्र का जीवन यापन करती एक दिन नगर सेठ ने कुछ साधु-संतों को नगर में चातुर्मास के लिए बुलाया और उस विधवा माँ को उनकी सेवा में रख दिया। वह नित्य उन साधु संतों की सेवा में लगी रहती । इसके बदले में उसे और उसके पुत्र को भोजन आदि मिल जाता था। जब भी साधु सत्संग करने बैठते तो माँ बेटे दोनों उनके सत्संग को ध्यान से सुना करते इतने छोटे बालक को शांत चित्त सत्संग सुनते देख साधु संत उसे स्नेह करने लगे ।

भगवत कथा के प्रभाव से उस बालक का मन शुद्ध हो गया और उसके पिछले जन्मो के समस्त पाप धुल गए। नगर से जाते समय महात्माओं ने प्रसन्न होकर बालक को भगवन्नाम का जप एवं भगवान के स्वरूप के ध्यान का उपदेश दिया और बालक नित्य ईश्वर का ध्यान और जप करने लगा ।

एक दिन साँप के काटने से उसकी माता की मृत्यु हो गई बालक अकेला रह गया । अतः वह गिरि, कन्दराओं में जाकर भगवान नाम का जप करने लगा। बालक के शुद्ध हृदय की पुकार भगवान तक पहुंची और भगवान उसके हृदय में प्रकट हो गए और उसे कहा कि समय आने पर तुम्हारा ये भौतिक शरीर छूट जाएगा और तुम मेरे प्रिय पार्षद के रूप में मुझे प्राप्त करोगे। समय आने पर नारद जी का पंच भौतिक शरीर छूट गया और कल्प के अंत में वह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए। देवर्षि नारद भगवान के भक्तों में सर्वश्रेष्ठ हैं। इन्हें भगवान का मन कहा गया है। इन्होंने नारद-भक्ति सूत्र की रचना की जिसमें भक्ति की बड़ी ही सुंदर व्याख्या है।

यह ज्ञान के स्वरूप, विद्या के भंडार, आनंद के सागर और विश्व के हितकारी हैं। वह श्रीमन्नारायन के महानतम भक्तों में माने जाते हैं और इन्हें अमर होने का वरदान प्राप्त है। भगवान विष्णु की कृपा से यह सभी युगों और तीनों लोकों में कहीं भी प्रकट हो सकते हैं । सर्वोत्तम भक्ति के प्रतीक और ब्रह्मा के मानस पुत्र माने जाने वाले देवर्षि नारद का मुख्य उद्देश्य प्रत्येक भक्त की पुकार भगवान तक पहुंचाना है।

जिस प्रकार भक्त अपने भगवान का चिंतन करते है उनका ध्यान और स्तुति करते हैं उसी प्रकार ईश्वर भी अपने भक्तों का ध्यान, चिंतन और यहाँ तक की उनकी स्तुति भी करते हैं इसका एक प्रमाण मुझे इस प्रकार मिला।

एक समय महीसागर संगम तीर्थ में भगवान श्री कृष्ण ने देवर्षि नारदजी की पूजा अर्चना की । वहाँ महाराज उग्रसेन ने पूछा : "जगदीश्वर श्री कृष्ण ! आपके प्रति देवर्षि नारदजी का अत्यंत प्रेम कैसे है?"
भगवान श्री कृष्ण ने कहा: "राजन! मैं देवराज इन्द्र द्वारा किये गए स्तोत्र पाठ से दिव्य-दृष्टि संपन्न श्री नारदजी की सदा स्तुति करता हूँ । आप भी वह स्तुति सुनिये :

'जो ब्रह्माजी की गोद से प्रकट हुए हैं, जिनके मन में अहंकार नहीं है, जिनका विश्व-विख्यात चरित्र किसी से छिपा नहीं है जो कामना या लोभ वश झूठी बात मुँह से नहीं निकालते, जो जितेन्द्रिय हैं, जिन में सरलता भरी है और जो यथार्थ बात कहने वाले हैं, जो तेज, यश, बुद्धि, विनय, जन्म तथा तपस्या इन सभी दृष्टियों से बड़े हैं, जिनका स्वभाव सुखमय, वेश सुन्दर तथा भोजन उत्तम है, जो प्रकाशमान, शुभदृष्टि-संपन्न तथा सुन्दर वचन बोलने वाले हैं, उन नारदजी को मैं प्रणाम करता हूँ ।
इस स्तुति के कारण वे मुनि-श्रेष्ठ मुझ पर अधिक प्रेम रखते हैं । देवर्षि नारदजी की इस स्तुति के द्वारा भगवान भक्तों के आदर्श गुणों को प्रकट करते हैं । भक्त की इतनी महिमा है कि स्वयं भगवान भी उनकी स्तुति करते हैं ।
अतः जो लोग नारद जी का उपहास करते हैं उन्हें चुगलखोर आदि शब्दों से अपमानित करते हैं उन्हें देवर्षि नारद के इन विशेष गुणों का चिंतन करना चाहिए क्योंकि वे इतने महान हैं कि भगवान भी उनकी स्तुति करते हैं। जीवन-मुक्ति की इच्छा रखने वाले साधु पुरुषों के हित के लिए वे सतत प्रयत्नशील रहते हैं ।
अतः उनके चरणों में मुझ अकिंचन का कोटि-कोटि प्रणाम हैं ! सर्वाधिकार सुरक्षित
  

अतिविचित्र है जिह्वा हमारी....

हमारी एक अति महत्वपूर्ण इंद्रिय है, ‘जीभ’ जिसे ‘रसना’ तथा ‘वाणी’ भी कहा गया है। इसकी विशेषता हैं कि ये भोजन के टुकड़े कर उन्हें शरीर के भीतरी भागों में पहुंचाने के साथ-साथ भोजन के रस अर्थात् उसके स्वाद का हमें अनुभव कराती है । इसके ये दोनों प्रकार के कर्म इस इंद्रिय को शरीर के सभी अंग अवयवों में विशेष महत्व का बना देते हैं । रसना और वाणी इन दोनों ही शब्दों का अलग-अलग अर्थ और महत्व है दोनों का व्यवस्थित रूप से उपयोग अति आवश्यक है। यदि जीभ हमारे विवेक रूपी अंकुश में रहे तो हमें उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करती है वहीं अगर इस पर अंकुश न रखा जाये तो ये हमारे स्वास्थ्य का नाश करती हुई हमारी जीवन शक्ति का ह्रास करती है साथ ही विभिन्न प्रकार के रोग हमारे शरीर में भर देती है।
जिह्वा रसना के रूप में…
ऐसा भी कहा जाता है कि जो व्यक्ति जिह्वा पर नियंत्रण नहीं रख सकता वह अपनी इंद्रियों को भी साध नहीं सकता और जब तक इंद्रियों को न साधा जाये तब तक कोई लक्ष्य भी हांसिल नहीं किया जा सकता । लेकिन हम मनुष्यों ने ज़ायके की वजह से,अनावश्यक चीजों की वजह से और न खाने वाली चीजों को खाने की वजह से अपने पेट का सत्यानाश कर लिया। अपनी सेहत को खराब कर लिया। अगर आपको सेहत ठीक रखनी है, मानसिक स्तर ठीक रखना है, तो आप संयम कीजिए।

कई मनुष्यों के द्वारा किया जाने वाला मांस भक्षण केवल अपनी स्वाद रूपी इच्छा को तृप्त करने के लिए ही किया जाता है।  हम हैं तो मनुष्य लेकिन अपनी स्वाद लोलुपता के कारण हमने अपने पेट को कब्रिस्तान बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी , जबकि प्रकृति ने पोषक तत्वों से भरपूर फल और सब्जियाँ दी हुई हैं अनेकों प्रकार के अनाज हैं ऐसे में उन सात्विक खाद्यों को छोड़कर तामसिक और विदेशी भोजन पीज़ा, पास्ता, मेगी, बरगर, हॉटडॉग जैसे विदेशी खान-पान का प्रयोग सर्वथा स्वास्थ्य की दृष्टि से अनुचित ही कहा जाएगा। 

जो व्यक्ति अपनी जिह्वा पर नियंत्रण रख सकता है वही अपनी कामेन्द्रियों को नियंत्रित कर सकता है ऐसे मनुष्य के लिए ब्रह्मचर्य रख पाना आसान होता है।
जिह्वा ‘वाक् शक्ति’ अर्थात वाणी के रूप में
वाणी अर्थात ‘वाक् शक्ति’ जिस सरस्वती भी कहते हैं। वाणी के द्वारा आप संसार को अपना मित्र भी बना सकते हैं और शत्रु भी, मीठी और संयत वाणी के महत्व को समझने वाला व्यक्ति बिना किसी अन्य साधन के संसार को मोहित कर सकता है । ये ही भाव प्रस्तुत दोहे में दृष्टिगोचर होता है...
''कौआ काको धन हरे, कोयल काको देत,
मीठे वचन सुनायके जग अपनो कर लेत ।।''
मैं तो हमेशा सच बोलता हूँ और सच्ची बात हमेशा कड़वी होती है इसलिए लोग बुरा मान जाते हैं जबकि वास्तविकता ये है कि सत्य का कड़वेपन से कोई ताल्लुक नहीं है । कड़वेपन का जो ताल्लुक है, वह आदमी के अहंकार से है।
 यदि आपकी वाणी सच्चाई का प्रदर्शन करने के लिए कड़वे लहज़े और शब्दों का प्रयोग करेगी तो निश्चित रूप से जिससे कड़वे शब्द कहे जाएंगे वो आपकी बात मानने से रहा इसका उलटा असर ये होगा कि उसकी दृष्टि में आपका सम्मान कम हो जाएगा और दूरियाँ बड़ने लगेंगी जैसा कि आज हमारे परिवारों में देखने को मिलता है ।
 जिद व्यक्ति की वाणी हर वक्त बिच्छू के डंक की तरह दूसरों को कष्ट पहुंचाती रहती है और दूसरों का अपमान करती रहती है ऐसे व्यक्तियों से लोग किनारा करने लगते हैं । यहाँ तक कि उनके द्वारा कही गई सही बात भी नहीं सुनी जाती और सुन भी ली जाए तो उसके पीठ पीछे लोग उसे भला बुरा ही कहते हैं। जो आदमी दूसरों को छोटा समझता है, वही कड़वे वचन बोल सकता है। जो आदमी घमंड से भरा हुआ है, वही कड़वे वचन बोल सकता है। 

आप सामने वाले की इज्जत कीजिए। अगर सामने वाले से शिकायत है तो उसे प्यार से समझाइए। जिनकी शिकायत आप दूर करना चाहते हैं, उनको समझाने की कोशिश कीजिए। अपने दिमाग को  संतुलित रखकर प्रेम और संतुलित शब्दों के साथ उन्हें बुरी से बुरी बात समझाई जा सकती है।
गलत सलाह देना, कड़वे वचन बोलना, असत्य बोलना, न खाने योग्य चीज़ें जैसे- मांस,मछली,शराब बुरी चीजें खाना ये सब वाणी के असंयम हैं जिनसे वाणी का प्रभाव समाप्त होने लगता है। अगर आप जीभ पर संयम रख सकें तो आपको आध्यात्मिकता के वे लाभ मिल सकते हैं, जिनसे लोग प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते लोग आपको सुनना पसंद करेंगे ।

कई साधु महात्मा जब कथा सत्संग करते हैं तो हजारों की संख्या में लोग एक चित्त होकर उन्हें सुनते हैं इसका कारण ये है कि उन संतों ने वाणी के संयम के द्वारा  अपनी वाणी को प्रभावशाली बनाया है यदि सावधानी पूर्वक वाणी का संयम रखा जाये तो व्यक्ति के द्वारा कहे गये वाक्य फलने लगते हैं उसके द्वारा दिये जा रहे आशीर्वाद या श्राप फलीभूत होने लगते हैं आपको शाप देने और वरदान देने की शक्ति मिल सकती है।

अतः वाणी के अपव्यय से बचें और दूसरों के लिए हितकर वचन कहें तो पूरा संसार आपका मित्र बन जाएगा और आपका सम्मान भी करेगा। सर्वाधिकार सुरक्षित

पतंगे

  ‘ ज़िंदगी क्या है खुद ही समझ जाओगे , बारिशों में पतंगे उड़ाया करो। ’ ये शेर आज की परिस्थितियों में बिलकुल माकूल बैठता है ये ज़िंदगी हमें ख...