3 May 2020

विद्यार्थी जीवन में संकल्प शक्ति की उपयोगिता एवं महत्व

संकल्प एक ऐसी अद्भुत शक्ति का नाम है, जिसके माध्यम से किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करना असंभव नहीं है। जब विद्यार्थी पूरे मनोयोग से किसी कार्य को करने का संकल्प लेता है तो उसके मार्ग में आने वाले कंटक उसकी संकल्प शक्ति के आगे तृणवत् बह जाते हैं । संकल्प का शाब्दिक अर्थ है दृढ़ता अर्थात पक्का इरादा। विद्यार्थी  को जीवन के सभी क्षेत्रों में संकल्प शक्ति कि आवश्यकता पड़ती है ।संकल्प की पूर्ति का प्रयास पूरे मन से किया जाए स्वयं पर और ईश्वर की कृपा पर विश्वास किया जाए तो असंभव कार्य भी सिद्ध होते देर नहीं लगती । दृढ़-इच्छा शक्ति वाले विद्यार्थी  के लिए संसार में कुछ भी असंभव नहीं या यूं भी कह सकते हैं कि दृढ़-इच्छा शक्ति से लबरेज़ विद्यार्थी के समक्ष समूची सृष्टि नतमस्तक रहती है ।

मन को नियंत्रित करने और इच्छाओं को वश में करने से ही संकल्प शक्ति बढ़ती है, परंतु यदि मन मैं किसी के अहित की भावना, स्वार्थ या वासना प्रवेश कर जाए तो संकल्प शक्ति निर्बल होते देर नहीं लगती। इच्छाएँ जितनी कम शुद्ध, सात्विक और लोक-कल्याणकारी होंगी उतनी ही संकल्प शक्ति बलवान होगी। 

यदि संकल्प शक्ति दृढ़ हो जाए तो दो अन्य शक्तियों का प्राग्ट्य स्वतः ही हो जाता है। इसमें पहली शक्ति है ‘अनुमान शक्ति’ दूसरी है ‘स्मरण शक्ति’ ।संकल्प शक्ति का विकास करने के लिए आवश्यक है कि हम अपने अंदर सहनशीलता, प्रसन्नता, सत्यता, दृढ़ता, धैर्य, और नियमित ध्यान जैसे गुणों को विकसित करें साथ ही असहनशीलता, अप्रसन्नता व चिड़चिड़ाहट, दुर्बलता और अधीरता जैसे दुर्गुणों से सतर्क रहें । ऐसे प्रयास करते रहने से संकल्प में बल आता है तथा हमारे आस-पास के लोग भी हमसे प्रसन्न रहते हैं।

यदि कभी परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल नहीं भी हैं तो कोई बात नहीं आप परिस्थितियों को नहीं बल्कि अपनी मन:स्थिति को बदलने का प्रयास करें। किसी भी परिस्थिति से भागें नहीं बल्कि उसका सदुपयोग करते हुए प्रत्येक परिस्थिति में अपने आप को प्रसन्न रखने का स्वभाव बनाएँ। इससे हमारे व्यक्तित्व में तेजस्विता और प्रखरता का विकास होता है।

संकल्पों का चुनाव बड़ी सावधानी पूर्वक करें और सबसे पहले वे संकल्प लें जो थोड़े से प्रयत्न और आसानी से पूर्ण हो जाएँ क्योंकि यदि शुरुवात में ही बड़े संकल्प ले लेंगे तो उन्हे निभाने में परेशानियाँ आएंगी और यदि वे पूरे नहीं हुए तो हम हतोत्साहित हो जाएँगे इसलिए पहले छोटे-छोटे संकल्पों का व्रत लें और पूरी तत्परता से उनको पूर्ण करें इस प्रकार धीरे-धीरे आगे बढ़ते जाएँ । 
जो भी विद्यार्थी  किसी भी क्षेत्र में सफलता पाना चाहता है उसके लिए ये भी आवश्यक है कि वह अपने मन -मस्तिष्क को शांत रखे अत्यधिक विचारों के प्रवाह से बचे अन्यथा संशय उत्पन्न होते हैं कि मेरा काम होगा या नहीं, मुझे सफलता मिलेगी या नहीं ऐसे विचारों से संकल्प बल कमजोर होने लगता है।
अत: सफलता के लिए मन को अनुशासित रखना आवश्यक होता है जितना अनुशासन होगा संकल्प में उतनी तेजस्विता आएगी और आशानुरूप सफलता प्राप्त होगी।

किसी भी कार्य को करते हुए मन को शांत रखना और कर्म करते हुए ईश्वर में विश्वास रखना चाहिए। उन सफल लोगों का चिंतन करना चाहिए, जिन्होंने विकट परिस्थितियों पर जीत हासिल की और सरलता एवं सहजता को अपनी सफलता का माध्यम बनाया। जबकि ऐसे धूर्त और दुष्ट लोगों से दूरी बनानी चाहिए जिन्होंने दूसरों का हक मारकर सफलता प्राप्त कर समाज में अपना स्थान बनाया है ।
लोग हमेशा आपके लिए अच्छा सोचें सदैव आपका सम्मान हो ऐसी भावनाओं को मन में न आने दें क्योंकि जो विद्यार्थी  सात्विक आचरण करते हैं सही मार्ग पर चलते हैं प्राय: उनको ही समस्याएँ ज्यादा होती है इसलिए समस्याओं का स्वागत करें उनसे डरें नहीं । समस्याएँ हमारे व्यक्तित्व में और सुधार लाती हैं साथ ही ये हमारे लिए सफलता का मार्ग भी खोल देतीं हैं ।

अत: दृढ़ संकल्प के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वाह करें और दूसरों के लिए प्रेम, दया, करुणा एवं उदारता को अपने जीवन में उतारें तो निश्चित रूप से आप अपने लक्ष्य को प्राप्त करने मैं सक्षम होंगे ।
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आत्महीनता एक अभिशाप

किसी मनुष्य के सामान्य गुणों कि प्रशंसा कर उसे सम्मान देना तथा उसे और श्रेष्ठ कार्य करने के लिए प्रेरित करना हम सभी मनुष्यों के मनुष्यत्व के विशेष गुणों को दर्शाता है ।इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति अपने से पद या उम्र में छोटे व्यक्ति से दुर्व्यवहार करता है उसकी छोटी-छोटी गलतियों के लिए उसे भला बुरा कहता है या दूसरों का अपमान करने के अवसरों की तलाश में रहता है  तो वह व्यक्ति जाने अनजाने अपने ही ओछेपन का परिचय देता है ।इस प्रकार का अमानवोचित व्यवहार दूसरे व्यक्ति के मन में आत्महीनता के रूप में सदा के लिए बैठ जाता है जिससे उबरने में कठिन परिश्रम और लंबा समय लगता है ।

मनुष्य के जीवन में सम्मान का बढ़ा महत्व है यदि व्यक्ति को उसके द्वारा किए गए किसी कार्य हेतु सम्मान मिलता है तो उस व्यक्ति का मनोबल आकाश की ऊंचाइयों को छूने लगता है तथा वह और सजगता से अपने कर्तव्यों के प्रति जागृत हो जाता है ।वहीं यदि किसी व्यक्ति को हर बात में रोका टोका जाये बात-बात में उसकी गलती बताई जाये तो चाहे कितना भी बुद्धिमान व्यक्ति क्यों न हो उसे अपने अंदर हीनता का भाव अनुभव होने लगता है और जब यह भाव धीर-धीरे उसके व्यक्तित्व में घर बना लेता है तो वह व्यक्ति के सभी गुणों को दीमक की भांति चट कर जाता है । विद्यार्थियों के परिप्रेक्ष्य में भी यही बात आती है |

‘आत्महीनता’ अर्थात अपनी योग्यता अपने ज्ञान के प्रति अविश्वास रखना और स्वयं को दूसरों की तुलना में गिरा हुआ मानना है यह एक ऐसा मानसिक रोग है जो विद्यार्थियों के जीवन की भावी संभावनाओं को ध्वस्त कर देता है ।कहते हैं कि हाथी को अन्य प्राणी डील-डौल में उनके वास्तविक आकार-प्रकार से कहीं बड़े दिखाई देते हैं। उसकी आंख की बनावट ऐसी होती है कि वह अन्य प्राणियों का आकार कई गुना बढ़ा-चढ़ाकर देखती है, इसी कारण हाथी दूसरे प्राणियों से भयभीत रहता है और सामान्यतः एकाएक किसी पर आक्रमण नहीं करता । इसी प्रकार आत्महीनता के कारण विद्यार्थियों अपने अंदर छुपी हुई संभावनाओं को भूल कर परिस्थितियों को उस प्रकार नहीं देखता जिस प्रकार की वह होती हैं बल्कि अपनी छोटी से छोटी समस्या को भी विकराल समझता है और एक प्रकार के अज्ञात भय से आतंकित रहता है ।

 इस प्रकार की मनोविकृति के कारण अधिकतर विद्यार्थियों मन ही मन स्वयं को तिरस्कृत करते रहते हैं और यह विकृति कब उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति बन जाती है उन्हें पता भी नहीं चलता और वे सही व उचित बात भी नहीं कह पाते इस प्रकार की मनःस्थिति का सबसे ज्यादा प्रभाव उनकी शिक्षा पर पड़ता है उन्हें एक डर लगा रहता है कि पता नहीं मैं परीक्षा में पास हो पाऊँगा या नहीं और ये डर ही उनकी योग्यता को निगल जाता है |
विचारणीय है कि बच्चों में आत्महीनता की यह भावना कहाँ से क्यों उत्पन्न होती है? मनोविज्ञान इसके कई कारण बताता हैं। बच्चों को बचपन में आवश्यक स्नेह-सम्मान न मिल पाना, माता-पिता या अभिभावकों की और से उपेक्षा, उपहास का कारण बनते रहना या अभावग्रस्त स्थिति में समय गुजारते रहना आदि ऐसे कारण हैं जो बचपन से ही ऐसी मानसिक परिस्थितियां उत्पन्न करते हैं, जिनके कारण बच्चे बड़े होकर भी आत्महीनता की महाव्याधि के शिकार बनते हैं।  यहाँ तक ही नहीं कई बच्चे तो नशे की लत में पढ़कर अपना जीवन का नाश कर बैठते हैं ऐसे बच्चे जिन्हें माता-पिता का स्नेह नहीं मिला तथा जो अकेलेपन के शिकार हैं और बचपन से ही अपने आप को उपेक्षित महसूस करते हैं उनमें चिंताजनक रूप में आत्महीनता की भावना पाई जाती है और प्रायः यही लोग पथभ्रष्ट होते हैं।

अतः उससे छुटकारा पाना अत्यंत आवश्यक है। परिस्थितियों को बढ़ा-चढ़ाकर देखने की आदत और अपने आप को दूसरों के सामने छोटा, हेय, हीन समझने का स्वभाव आत्महीनता की भावना का प्रमुख लक्षण है। इस व्याधि को जड़-मूल से मिटाने हेतु आवश्यक है कि हम उचित और अनुचित की पहचान कर सकें और अपने मनोबल को इतना दृढ़ करें कि समय आने पर हम उचित को ही अपनाएँ और अनुचित का दृढ़ता से बहिष्कार और विरोध कर सकें सहमत होना और हां कहना अच्छी बात है, पर वह इतनी अच्छी बात नहीं है कि यदि कोई बात अनुचित लग रही है और अनुचित लगने के पर्याप्त कारण हैं, तो भी हां किया ही जाए और सहमत हुआ ही जाए। स्पष्ट रूप से, निःसंकोच भाव से अस्वीकार करने की हिम्मत भी रखनी चाहिए। सोच-विचार करने में यह बात भी सम्मिलित रखनी चाहिए कि हर सही-गलत बात में हां-हां करते रहने से दूसरों की दृष्टि में अपने व्यक्तित्व का वजन घट जाता है और आत्मगौरव को ठेस पहुंचती है।

एक मानसिक रूप से परिपक्व व्यक्तित्व वही है जो अपने विचारों को स्पष्ट किंतु नम्र और संतुलित शब्दों में व्यक्त कर सके ।मनुष्य ईश्वर का पुत्र है और वेदों, पुराणों में ईश्वर को सर्वशक्तिमान और सर्वगुण सम्पन्न कहा गया है तो जब हमारे पिता परमात्मा हैं तो हम हीन कैसे हो सकते है हमारे अंदर भी अनेकानेक महत्वपूर्ण योग्यताएं विद्यमान है जैसे ही ये भाव हम अपने मन में लाते है हमारे क्षुद्र विचार तिरोहित होने लगते है कुंठाओं की गांठ खुलने लगती है ,आवश्यकता बस यह है कि हम इस चिंतन को निरंतर बनाए रखें ।  सर्वाधिकार सुरक्षित



पतंगे

  ‘ ज़िंदगी क्या है खुद ही समझ जाओगे , बारिशों में पतंगे उड़ाया करो। ’ ये शेर आज की परिस्थितियों में बिलकुल माकूल बैठता है ये ज़िंदगी हमें ख...