24 Apr 2020

प्रेम और उसका दिव्य अनुभव


कबीरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर
                                         पीछे-पीछे हरि फ़िरे कहत कबीर कबीर||
 यदि मनुष्य का मन निर्मल हो जता है तो उसमे पवित्र प्रेम उपजता है वो प्रेम जिसके वशीभूत होकर स्वयं ईश्वर भी अपने प्रेमी के पीछे दौड़ने के लिए विवश हो जाते है| ये गोपियों का निस्वार्थ, निर्मल प्रेम ही था जिनकी याद में बैठकर द्वारिकाधीश अपने मित्र उधौ के समक्ष अश्रु बहाते हुए कहते है -
’उधौ मोहि बृज बिसरत नाही’
प्रेम क्या है ?
जीवन का इससे बड़ा गूढ़ सम्बन्ध क्यों है? किस शक्ति के अंतर्गत मनुष्य जाने अनजाने ही इसे तलाश करता है। वह सदा प्रेम की एक गुदगुदी की प्रतीक्षा करता है व मिल जाने पर कभी न बिछुड़ने की आशंका की व्याकुलता सी अनुभव आती है। प्रेम एक मीठा सा दर्द है जो जीवन का सुरीला तार है, दुखियों की आशा और वियोगियों का आकर्षण तथा थकावट की मदिरा, व्यथितों की दवा है जो हृदय में कोमलता भर कर आत्मा को आनंद की अनुभूति करा देता है। ऐसा आनंद जिसे शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता | जीवन में सभी प्राणी किसी न किसी को प्रेम करते ही हैं और उस प्रेम को अपनी-अपनी कसौटी में कसते हैं। बगैर प्रेम के कोई जीवित नहीं रह सकता, किसी को भी प्यार करना ही पड़ेगा, नीरस जीवन नहीं काटा जा सकता है। यहाँ उस प्रेम का वर्णन है जिसे हमारे कवि प्रेम-दर्द कह कर अमर करते हुए हमारे हृदय पट खोल गये हैं। प्रेम तो सभी का जन्मसिद्ध अधिकार है| लेकिन प्रेम की विशेषता है की इसमें एक प्रकार का नशा, दर्द और जिद है इस दर्द से पीड़ित मीरा इसीलिए ही तो कहती थी......
‘हेरी मे तो प्रेम दीवानी मेरो दर्द न जाने कोय|’
कितना ऊँचा प्रेम रहा होगा मीराबाई का जिन्होंने अपने प्रेमी (कृष्ण) को कभी देखा नहीं था केवल दूसरों से सुना था और ऐसे प्रेमी के प्रेम में वो डूबती चली गयी | इसी प्रकार ऊधो जब योग का संदेशा लेकर विरहणी गोपियों को समझाने जाते हैं तो गोपी कहती हैं.....
                         “श्याम तन श्याम मन, श्याम ही हमारो धन,                            
आठों याम ऊधो हमें श्याम ही से काम है।
श्याम हिये, श्याम जिये,श्याम बिन नाहीं तिये,
अन्धे को सी लाकड़ी आधार श्याम नाम है॥
श्याम गति श्याम मति श्याम ही हैं प्राणपति,
श्याम सुखदाई सो भलाई शोभा धाम है।
यदि प्रेम के सच्चे अर्थों को जानने वाली प्रेम की इतनी दिव्य विभूतियाँ पैदा न हुई होतीं तो आज प्रेम की कीमत शायद कुछ भी न होती, जब हृदय प्रेम से विभोर हो उठता है तब उसे कुछ नहीं सूझता,तभी तो कहते हैं कि प्रेम अन्धा है। सच्चा और निर्विकारी प्रेम कुछ पाना नहीं चाहता बल्कि अपना सर्वस्व अपने प्रेमी को अर्पित कर देना चाहता है लेकिन लगातार बदलते परिवेश में प्रेम का अर्थ बहुत भटक गया है इसे अश्लीलता की चादर ओढ़ाकर केवल प्रदर्शन का माध्यम बना दिया गया है |
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31 Oct 2017

वसुधैव कुटुम्बकम’ का भाव रखने वाली एकमात्र संस्कृति ‘भारतीय संस्कृति


हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति समूचे विश्व की संस्कृतियों में सर्वश्रेष्ठ और समृद्ध संस्कृति है | भारत विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता का देश है। भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण तत्व शिष्टाचार, तहज़ीब, सभ्य संवाद, धार्मिक संस्कार, मान्यताएँ और मूल्य आदि हैं। अब जबकि हर एक की जीवन शैली आधुनिक हो रही है  भारतीय लोग आज भी अपनी परंपरा और मूल्यों को बनाए हुए हैं। विभिन्न संस्कृति और परंपरा के लोगों के बीच की घनिष्ठता ने एक अनोखा देश ‘भारत’ बनाया है। हर भारतीय का ये कर्तव्य है कि वो अपनी भारतीय संस्कृति और उसके वैदिक ज्ञान का अंतरात्मा से अनुकरण करे जिससे की इस संस्कृति का और प्रचार प्रसार हो ये बढ़ती रहे तथा तेजस्वी रूप धारण करे। यह संस्कृति ज्ञानमय है और युतियुक्त कर्म करने की प्रेरणा देने वाली संस्कृति है। ये वो संस्कृति है जो मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की अनुकरणीय और लीलापुरुषोत्तम श्री कृष्ण की अनुसरणीय शिक्षाओं की साक्षी है | भारतीय संस्कृति का अर्थ है, सर्वांगीण विकास, सबका विकास। भारतीय संस्कृति की आत्मा छुआछूत को नहीं मानती और ना ही हिन्दू और मुसलमान के भेद को जानती है | यह प्रेमपूर्वक और विश्वास पूर्वक सबका आलिंगन करके, ज्ञानमय और भक्तिमय कर्म का अखण्ड आधार लेकर माँगल्य-सागर की ओर तथा सच्चे मोक्ष—सिन्धु की ओर ले जाने वाली संस्कृति है।
भगवान् ने इस इच्छा से हम मनुष्यों का निर्माण किया है कि हम सब उसकी इस सृष्टि को अधिक सुन्दर, अधिक सुखी, अधिक समृद्ध और अधिक समुचित बनाने में उसका हाथ बंटायें। अपनी बुद्धि, क्षमता और विशेषता से अन्य पिछड़े हुये जीवों की सुविधा का सृजन करें और परस्पर इस तरह का सद्व्यवहार बरतें जिससे इस संसार में सर्वत्र स्वर्गीय वातावरण दृष्टिगोचर होने लगे। ये वो संस्कृति है जो अधिकार से ज्यादा कर्तव्य पालन पर बल देती है भारत देश और यहाँ की संस्कृति अनेक धर्मो को और उनकी शिक्षाओं को न केवल अपने में संजोय हुए है अपितु इस देश ने या संस्कृति ने किसी भी धर्म को श्रेष्ठ या निम्न नहीं आंका भारतीय संस्कृति यथार्थ के बहुआयामी पक्ष को स्वीकार करती है तथा दृष्टिकोणों, व्यवहारों, प्रथाओं एवं संस्थाओं की विविधता का स्वागत करती है। यह एकरूपता के विस्तार के लिए विविधता के दमन की कोशिश नहीं करती। भारतीय संस्कृति का आदर्श-वाक्य अनेकता में एकता एवं एकता में अनेकता दोनों है।
भारत एवं भारतीय संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का भाव रखने वाली संस्कृति है|  भारतीय संस्कृति ने न केवल भारत को अपितु समूची धरा को सदैव एक कुटुंब (परिवार) माना है जबकि अन्य देशों ने भारत को केवल बाज़ार मान है| लेकिन ये संस्कृति और इस संस्कृति में रचे बसे लोग इतने उदार है की हमने सदैव अन्य देशों की संस्कृतियों का दोनों बाहें फैलाकर स्वागत किया है |  भारतीय संस्कृति के उपासकों की महान यात्रा अनादि काल से आरम्भ हुई है। इस संस्कृति में व्यास,वाल्मीकि,बुद्ध,महावीर, शंकराचार्य,रामानुज, ज्ञानेश्वर—तुकाराम, नानक,कबीर एवं महर्षि अरविन्द जैसी महान विभूतियां हुई जिन्होंने इस संस्कृति को आगे बढ़ाया और समृद्ध बनाया।
आइए, हम सब अपने आपसी मतभेदों को दरकिनार कर इस पावन—यात्रा में सम्मिलित हों। आज भारतीय संस्कृति के ये सारे सत्पुत्र हम सबको पुकार रहे हैं। यह पुकार जिसके हृदय तक पहुँचेगी और जो अपने राष्ट्र और उसकी संस्कृति की सेवा के लिए सजग हो जायेगा उसी का जीवन धन्य होगा।

पतंगे

  ‘ ज़िंदगी क्या है खुद ही समझ जाओगे , बारिशों में पतंगे उड़ाया करो। ’ ये शेर आज की परिस्थितियों में बिलकुल माकूल बैठता है ये ज़िंदगी हमें ख...