2 Sept 2025

पतंगे

 

‘ज़िंदगी क्या है खुद ही समझ जाओगे, बारिशों में पतंगे उड़ाया करो।’

ये शेर आज की परिस्थितियों में बिलकुल माकूल बैठता है ये ज़िंदगी हमें खुदा ने बक्शी है इस पर हम से ज़्यादा इख्तियार ख़ुदा का है। लेकिन हम लोग ज़रा-सी परेशानी और मुसीबतों के आते ही या तो शिकायतों का पिटारा खोलकर बैठ जाते हैं या फिर इस ज़िंदगी को बदसेबत्तर समझकर इसे बर्बाद या खत्म कर देते हैं ।

ख़ुदा ने ये ज़िंदगी हमें हल्के-फुलके ठंग से बसर करने के लिए अता फरमाई थी । लेकिन हमने अपनी जायज़ और नाजायज़ हसरतों को इतना बढ़ा लिया की ख्वाहिशें पूरी होने का नाम ही नहीं लेती एक के बाद एक पैदा होती रहती हैं और हर ख्वाइश पहली से ज़्यादा जायज़ लगती है । इन्हीं ख्वाइशों को मुकम्मल करने के लिए ज़िन्दगी दिन-रात गुजरती जा रही है।

किताबें

 

हमने सुना है की किताबें मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र है लेकिन ये अनुभव मुझे अभी कुछ दिन फले ही हुआ जब मीने एक उपन्यास पढ़ना शुरू किया फले एक डॉ पगे तो मन बे मन पढ़ा ज्ञ लेकिन धीरे-धीरे उस पुस्तक ने मुझे अपने मोहपाश में ऐसा बांधा की उस साढ़े चार सो पागे के उपन्यास को मीने केवल पाँच दिन में पढ़कर ही डीएम लिया ।

हमें अपने जीवन में कहीं ना कहीं किसी ना किसी रूप में किताबों से जुड़ना रहना चाहिए। ये साहित्य हिन्दी अङ्ग्रेज़ी किसी भी भाषा में हो सकता हैं । जो व्यक्ति किसी ना किसी रूप में साहित्य से जुड़ा रहता है उसमे नकरतमकता का प्रतिशत और लोगों की अपेक्षा कम होता है। साहित्य से जुड़ा व्यक्ति काल्पनिक पात्रों के माध्यम से जीवन की ऊँची-नीची परिस्थितियों से इतना रूबरू हो चुका होता है कि उसे अपने जीवन की समस्याएँ कम लगने लगती हैं। सुख-दुख के प्रसंगों में उसे अलग-अलग कहानियों के पात्र याद आते हैं जो काल्पनिक होते हुए भी पाठक के मनोबल को बनाए रखते हैं । जो साहित्य से जुड़े है सकारात्मक किस्से, कहानियाँ पढ़ते हैं वह  निराशा के कुएँ में नहीं गिरते इसलिए भले ही एक पृष्ठ पढ़ें लेकिन प्रतिदिन कोई ना कोई अच्छी पुस्तक ज़रूर पढ़ें ।

मनपसंद


ज़्यादा नहीं तो थोड़ा ही सही कुछ समय ऐसा ज़रूर निकालें जिसमें आप अपना मनपसंद कार्य करें। कई लोगों का ये अनुभव है कि जब भी कोई काम हम अपने मन के अनुरूप करतेहैं तो उस काम का परिणाम हमारी आकांक्षाओं से भी श्रेष्ठ निकाल कर सामने आता है जिससे हमारा आत्मविश्वास अपने चरम पर पहुँच जाता है और अपार आनंद की अनुभूति होती है सो अलग ।

वहीं जब हमें अपने मन के अनुरूप कार्य न मिले और मजबूरी में या दबाव में कोई कार्य करना  पड़े तो उस कार्य से शारीरिक कष्ट और मन में खिन्नता ही उत्पन्न होती है ।

मन से किया गया कठिन से कठिन से कठिन कार्य भी आत्मविश्वास और संतुष्टि प्रदान करता है जबकि ज़बरदस्ती या बेमन से किया गया सरल ,सहज कार्य भी केवल खीज और दुख उत्पन्न करता है। अतः अपनी रुचि और योग्यता को पहचान करउसके अनुरूप कार्य करें तो फिर वह कार्य, कार्य नहीं रहेगा बल्कि सुख देने वाला एक आनंददायक मनोरंजन बन जाएगा।

हेयभाव

 

मित्रों बात ये है कि हम दूसरों के प्रयासों और उनकी विशेषताओं से प्रभावित होते हैं और कहीं न कहीं हमारे मन में स्वयं के लिए हेय भाव आ जाता है। हम सोचते हैं कि काश हम भी उस जैसे होते तो उतने ही सफल होते जब हम इस तरह के विचार मन में लाते हैं तो कहीं न कहीं हम अपनी योग्यताओं को भूलकर स्वयं का अपमान करते हैं और स्वयं को कमतर आँकने लगते हैं जिससे हमारा मन और बुद्धि की योग्यता पर अनुचित प्रभाव पड़ता है ।

किसी की उपलब्धियों को देखकर प्रसन्न होना चाहिए और उसने सफलता कैसे पाई ये सीखना चाहिए लेकिन उसके जैसे ही बनने का हठ नहीं करना चाहिए। क्योंकि हर व्यक्ति की अपनी योग्यता संस्कार और प्रयास होते हैं जिनके आधार पर वो अपना जीवन चलाता है ।

एक ही माता के उदर से जन्म लेने वाले बच्चों के आचार-विचार कर्म सब अलग होते हैं कोई डॉ बनता है तो कोई क्लर्क इसलिए स्वयं को जानिए और अपने प्रति कमतरी का भाव छोड़कर स्वयं का सम्मान कीजिये फिर देखिये आपकी योग्यताएँ किस प्रकार आपका जीवन महकाती हैं और आपके जीवन से संतोष की सुगंध किस प्रकार आती है ।

मेडिटेशन (ध्यान)

 

शरीर कितना भी स्वस्थ हो लेकिन हमारा मन या मस्तिष्क उदासीन है तो ये स्वस्थ शरीर भी उदासीन रहेगा और पूरे पैनेपन से कार्य नहीं कर पाएगा ।शरीर को स्वास्थ्य रखने के लिए जिस प्रकार व्यायाम की आवश्यकता होती है उसी प्रकार मन मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के लिए ध्यान की आवश्यकता होती है ।

ध्यान किसका ?‘शून्य’ का अर्थात ना किसी देवता का न किसी देवी का बल्कि अपने मस्तिष्क को विचारहीन करना कुछ नहीं सोचना हालांकि ये कठिन है लेकिन प्रयास करें इसके लिए ध्यान में बैठते समय अपने श्वास की गिनती करें पहले एक से दस, फिर एक से बीस फिर निरंतर संख्या बढ़ाते रहें गिनती में गलती होने पर फिर एक से शुरू करें ऐसा करने पर आप पाएंगे की आपका मन केवल गिनती में लगा हुआ है और उसकी भागदौड़ बहुत सीमा तक कम हो गयी है। 

ये प्रयोग हमारी स्मरण शक्ति और एकाग्रता को बढ़ाने में सहायता करता है जो कि आज हर वर्ग के व्यक्ति के लिए आवश्यक है ।

करीबी दोस्त

 

‘दोस्त’ यह शब्द याद आते ही हम सब के ज़हन में कोई न कोई चेहरा घूमने लगता है| हमारे आज भाग-दौड़ भरे जीवन और एक दूसरे से आगे बढ़ने की धमाल-चौकड़ी में हम अपने उन साथी-संगियों और करीबीयों की उपेक्षा कर बैठे हैं जिनके साथ हमने कभी जीवन का शानदार समय बिताया था। वे हमारे स्कूल, कॉलेज, ऑफिस या हमारे यायावरी के दिनों के यार हो सकते हैं | जिनके सामने हम अपना दिल खोलकर रख देते थे | जिनके साथ रहकर हमने बहुत कुछ सीखा और उनके अनुभव से बहुत कुछ पाया |

अतः हमें अपने ऐसे साथियों से फिर से मिलने और उनसे मजबूती से जुड़ने का प्रयत्न करना चाहिए। आज सोशल मीडिया से हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ है सोशल मिडिया भी हमारे खोये हुए साथियों को हमसे मिलाने में सहायक हो सकता है ।

इससे दो फायदे तो निश्चित रूप से होंगे एक तो उन लोगों से मिलकर पुराने दिनों की मधुर स्मृतियाँ सहज ही हमारे मन को आनन्द से भर देगी | दूसरा हमारे जीवन में आने वाले जो उतार-चढ़ाव हैं जिन्हें हम कई बार अपने परिवार से साझा नहीं कर पाते उन्हें हम अपने करीबी दोस्तों से कहकर अपना मन हल्का कर सकते हैं तो चलो मित्रों आज ही अपने उन पुराने मित्रों की सूची बनाकर उन्हें ढूँढते हैं।

सिक्के के दो पहलू


दोस्तों, हमारा जीवन दो ही परिस्थितियों के इर्द-गिर्द गति करता है- एक है सकारात्मकता और दूसरी नकारात्मकता | हमारे आस-पास जो भी ऊर्जा फैली हुई है उसे सकारात्मक और नकारात्मक बनाना सब हमारे हाथ में है। सुने जाने वाले और कहे जाने वाले शब्दों का मन, मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है इसीलिए तो जब कोई प्रेमाप्लावित शब्दों का प्रयोग करता है तो हमारे निराश और दुखी मन में आनंद का अनुभव होता है, वहीं जब कोई हमसे कटु या कर्कश बोलता है तो हम आवेशित हो उठते हैं । सकारात्मकता और नकारात्मकता ये सिक्के के दो पहलू उछल-उछल कर जीवन का रूख बदलते रहते हैं |

अतःआज कुछ महत्वपूर्ण वाक्य आपको बता रहा हूँ जिसका दिन में एक बार मन ही मन या जैसा अनुकूल लगे वैसे बोलकर आप अपनी मनःस्थिति बदल सकते हैं| थोड़े ही अभ्यास से इन वाक्यों की सकारात्मक ऊर्जा आपको ईश्वर का स्मरण कराने के साथ-साथ आपके मनोभावों को सकारात्मकता से भर देगी | ऐसे ही कुछ वाक्य हैं ”हरि इच्छा प्रबल है” अर्थात भगवान की जो इच्छा है वही मेरी इच्छा है।,”हरि करे सो खरी” अर्थात भगवान मेरे लिए जो कर रहे हैं मेरे लिए वही उचित है| या ”मुझ पर ईश्वर की विशेष कृपा है।”

इन तीन वाक्यों का प्रयोग आप भीषण से भीषण स्थिति में भी करेंगे तो भी आपको लाभ ज़रूर होगा और आप डिप्रेशन और स्ट्रेस जैसी समस्याओं से बच सकेंगे। इन वाक्यों को बोलने का या मन ही मन याद करने का अभ्यास करें निश्चित ही आपका मन दुखद परिस्थितियों में भी शांत रहेगा और आप स्वयं को ईश्वर की कृपा से घिरा पाएंगे।

अभाव

             ईश्वर से सदैव यह प्रार्थना करें कि हे! ईश्वर मेरे जीवन में किसी भी प्रकार का अभाव देना परंतु कभी भी मुझे आत्मविश्वास का अभाव मत देना क्योंकि कितनी भी कीमती वस्तु व्यक्ति के जीवन से चली जाये तो हम उसे प्राप्त कर सकते हैं लेकिन अपना आत्मविश्वास चला जाते तो उसके बिना जीवन अत्यंत कठिन हो जाता है क्योंकि आत्मविश्वास ही हमें वह दृष्टि प्रदान करता है जहाँ  दुख, भय और निराशा की स्थिति में भी अवसर खोज लेते हैं ।

वहीं यदि आत्मविश्वास चला जाये तो मनुष्य को अपनी छोटी-छोटी समस्याएँ भी अत्यंत विकराल और भयावह लगने लगती हैं। आत्मविश्वास के अभाव में मनुष्य का चित्त इतना कमजोर हो जाता है कि वह गंभीर विचारों पर चिंतन ही नहीं कर पाता अतः अपने आत्म विश्वास को दृढ़ बनाएँ ईश्वर पर भरोसा करें और छोटी-छोटी समस्याओं से दुखी न होकर उनका पूर्ण विश्वास के साथ सामना करें फिर देखिये आपका दृढ़ आत्मविश्वास औरों के लिए कैसे प्रेरणा स्त्रोत बनता है ।

मुस्कराहट

 

                मुस्कुराहट मनुष्य का सर्वोत्कृष्ट अलंकार है जो उसकी छवि को अधिक प्रभावशाली और सौमनस्यता से अलंकृत करता है हँसता मुस्कराता व्यक्ति उस पुष्प की तरह है  जिसे देखकर हम उसकी आत्मिक संतुष्टि और आनंद की महक का अनुभव कर सकते हैं । जहाँ प्रसन्नचित्त मनुष्य को देखकर हमारा मन प्रफुल्लित हो जाता है वहीं किसी हताश,निराश व्यक्ति को देखकर हम भी वैसे ही भाव अनुभव करने लगते हैं ।

यदि हम विचार करें तो पाएंगे हमारा सुंदर स्वस्थ शरीर, हमारे माता-पिता, इष्ट-मित्र, बंधु-बांधव ये सब हमारे पास हैं हमारा शरीर स्वस्थ है हम दोनों समय भरपेट भोजन कर रहे हैं ये सभी हमारे प्रसन्न रहने के पर्याप्त कारण हैं । अपनी छोटी-छोटी समस्याओं को भूलकर यदि हम इन पर चिंतन करें तो हम सदैव प्रसन्न रह सकते हैं, और यदि इन्हें हम भूल जाएँ तो हमारे आसपास फैली हुई नकारात्मकता और समस्याएँ हमें धर दबोचेंगी।

समय प्रबंधन (कविता)

 

हे! मित्र समय प्रबंधन सीखो ,

जीवन सुरभित हो जायेगा ।

नित-नव पल्लव महकेंगे और ,

जीव दीप सा बन जायेगा ।।

 

समय प्रबंधन सिखलाता है,

सारे काम समय पर करना ।

एक-एक क्षण की प्रतिपल,प्रतिक्षण ,

सार्थकता संरक्षित करना ।।

 

गाँधी बापू ने बतलाया,

समय प्रबंधन कैसे हो ।

सभी कार्य मिल करें समय पर,

भारत का अभिनन्दन हो ।।

 

समय नियोजन कर विद्यार्थी,

अपने लक्ष्य को पायेंगे ।

जीवन के जो भी सपने हैं,

सारे सच हो जायेंगे ।।

 

जीवन महकेगा धरती पर,

इतिहास नया लिख जायेंगे ।

पद गरिमा बढ़ती जाएगी,

नित-नव गौरव पायेंगे ।।

पंकज कुमार शर्मा ‘प्रखर’

कोटा, राज.

 

 

 

मंथरा के ऋणी….. श्रीराम


‘मंथरा’ ये शब्द सुनते ही हमारे सामने एक अधेड़ उम्र की कुरूप,घृणित किन्तु रामायण की अत्यंत महत्वपूर्ण स्त्री की छवि बन जाती है जिसका नाम था ‘मंथरा’। इस पात्र ने हमारे मन मस्तिष्क पर इतना गहरा प्रभाव छोड़ा है कि आज भी जब हम किसी नकारात्मक स्वभाव वाली महिला को देखते हैं तो केवल ये एक शब्द (मंथरा) ही उसकी प्रवृत्ति और उसके स्वभाव की व्याख्या कर देने में सक्षम नज़र आता है। रामायण का यह पात्र समाज में इतना घृणित माना जाता है कि आज तक कोई भी अपनी कन्या का नाम मंथरा नहीं रखता है।

संस्कृत में मंथरा शब्द का अर्थ ’कुबड़ा’ होता है और मंथरा के कुबड़े होने के कारण ही उसे ये नाम मिला होगा हिंदी में मंथरा शब्द का अर्थ ’मंदमति’ है । मंथरा राजा दशरथ की तीसरी पत्नी और राजा अश्वपति के यहाँ काम करने वाली कैकेयी की धाय थी । कैकेयी के प्रति इसका विशेष लगाव था इसलिए कैकेयी के पिता अश्वपति ने विवाह के पश्चात कैकेयी के साथ मंथरा को भी अयोध्या भेज दिया था । कैकेयी की धाय माँ होने के कारण उसका प्रभाव भी कैकेयी पर बहुत था। रामचरित्र मानस के रचयिता भले ही महाकवि तुलसी दास हैं लेकिन इस महाकाव्य की भूमिका तैयार करने वाली देवी मंथरा लगती हैं क्योंकि मानस में तुलसीदास जी लिखते हैं कि.........नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकइ केरि, अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि ।।

अर्थात्- मन्थरा नाम की कैकेई की एक मंदबुद्धि दासी थी, उसे अपयश की पिटारी बनाकर देवी सरस्वती उसकी बुद्धि को फेरकर चली गई। अर्थात राम वनवास का षड्यंत्र मंथरा ने नहीं बनाया बल्कि मंथरा को देवताओं ने अपने उद्धार का और इस षड्यंत्र का निमित्त बनाया था।

मानस में ये भी आता है कि देवी सरस्वती द्वारा ऐसा कुचक्र बनवाने के लिए देवता उनसे प्रार्थना करते हैं और जब देवी ऐसा करने में संकोच व्यक्त करती हैं तो तुलसीदास लिखते हैं ……‘बार बार गहि चरण संकोची, चली बिचारि बिबुध मति  पोची’।।

अर्थात्- बार-बार चरण पकड़कर देवताओं ने सरस्वती को संकोच में डाल दिया। तब वे ये विचार करती हुई चलीं कि देवताओं कि मति ओछी है।

अगली पंक्ति में तुलसी बाबा ने लिखा कि माँ सरस्वती सोचती हैं ‘ऊंच निवासु नीच करतूती,देखि न सकहि पराई बिभूती’।।

अर्थात्- ये देवता ऊँचे स्थानों पर निवास करते हैं अर्थात महान माने जाते हैं लेकिन इनकी बुद्धि बहुत खोटी है ये दूसरों की विभूति(ऐश्वर्य)देख नहीं सकते।

यदि ये कहा जाए कि राजकुमार राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम और जन-जन के राम बनाने में जो महत्वपूर्ण भूमिका देवी मंथरा ने निभाई है और देव कल्याण और जनकल्याण के लिए अपयश का जो विषपान किया है उसके लिए मंथरा सदैव प्रणम्य रहेंगी तो ये अतिशयोक्ति नहीं होगी ।

‘कम्ब-रामायण’ में ये वर्णित है कि राम वनवास के बाद मंथरा को कारागार में डाल दिया जाता है और राम वनवास के पश्चात उसे वहाँ से मुक्त करवाते हैं और उसे धन्यवाद भी देते हैं। कई विचारकों का ये भी मानना है कि राम कैकेयी और मंथरा का कार्य बुरा होते हुए भी समाज के हित में था क्योंकि उन्हीं के कारण राम वन जा पाए और अपने अवतार का वास्तविक कार्य रावण-वध कर पाए ।

मंथरा इतने युगों से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के लिए अपयश का जो दंश झेलती आ रही है उसके लिए नरोत्तम श्रीराम सदैव देवी मंथरा के ऋणी रहेंगे।              

पंकज कुमार शर्मा ‘प्रखर’

साहित्यकार

कोटा, राज॰

11 Jan 2024

युवा नरेन्द्र से स्वामी विवेकानंद तक....

 जाज्वल्य मान व्यक्तित्व के धनी स्वामी विवेकानंद ‘विवेकानंद’बनने से पहले नरेन्द्र नाम के एक साधारण से बालक थे। इनका जन्म कोलकता में एक संपन्न परिवार में हुआ । नरेंद्र पूर्व के संस्कारों और पश्चिम की सभ्यता का समन्वय थे, क्योंकि  इनके पिता पाश्चात्य संस्कृति से अत्यधिक प्रभावित थे, जबकि इनकी माता भारतीय सनातन संस्कृति के संस्कारों और आध्यात्मिक ज्ञान से अविभूत एक भारतीय नारी थी । जिनका ज्यादातर समय आध्यत्मिक वार्तालाप आदि में बीतता था ।

 नरेंद्र पर अपनी माँ के द्वारा दिए गये संस्कारों का अत्यधिक प्रभाव था । अपने गुरु ठाकुर रामकृष्ण परमहंस के ज्ञान और माँ के संस्कारों का ही प्रभाव था कि अपने सिर्फ़ 40 वर्षों के जीवन काल में उन्होंने ऐसे कार्य किये जिसने समाज और समूचे देश को नई दिशा दी, नई चेतना दी, और आज इतने  वर्षों बाद भी उनके विचारों और आदर्शों की प्रासंगिकता बनी हुई है ।

 नरेंद्र के जीवन में दुःख और संकट के बदल तब उमड़ आये जब उनके पिता का देहावसान हो गया। घर चलाने के पर्याप्त साधन उनके पास नहीं थे। ऐसी परिस्थितियों में भी नरेंद्र ने बड़ी शांति और हिम्मत से काम लिया मुझे वो घटना याद आती है जिसमे नरेंद्र नौकरी मांगने के लिए अपने एक रिश्तेदार के पास जाते हैं । वह रिश्तेदार उनको बोलता है कि तुम रामकृष्ण परमहंस के पास चले जाओ, वह तुम्हे किसी मंदिर की सेवा दिला देंगे, और तुम्हारा गुजरा चल जाएगा।

 नरेंद्र तब तक विवेकानंद नहीं हुए थे।  नरेंद्र एक नौकरी की अभिलाषा लेकर परमहंस के पास गये, और उन्होंने परमहंस से कहा कि मुझे एक नौकरी दे दो, मैं बहुत गरीब हूँ, परमहंस ने नरेंद्र को देखा और मुस्कुरा दिए, आँखों से इशारा करते हुए बोले- ‘वह सामने काली माता खड़ी है, उनसे बोल दे वो दे देगी।’ विवेकानन्द ने जाकर जैसे ही काली माता की प्रतिमा को देखा तो मंत्रमुग्ध हो गये और जो  माँगने आये थे उसे भूल कर अपने लिए सद्बुद्धि और देश सेवा माँगने लगे। ऐसा उनके साथ एक बार नहीं कई बार हुआ। जैसे ही वह नौकरी बोलने का प्रयत्न करते उनके मुँह से देश सेवा और सद्बुद्धि प्राप्त करने की बात ही निकलती ।

 अंत में वे परमहंस के पास आये सारी घटना उनको बताई । तब परमहंस बोले तुम्हारा जन्म एक ऊँचे उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हुआ है। परमहंस ने उन्हें अपना शिष्य बना लिया और उनके सानिध्य में रहकर नरेंद्र ने अध्यात्म के कई सोपान पार किये। उनकी सूक्ष्म उपस्थिति आज भी हमारा मार्गदर्शन कर रही है।

 स्वामी विवेकानंद हम युवाओं के लिए एक कुछ महत्वपूर्ण काम छोड़कर गये हैं । उन्हें गये हुए एक शताब्दी से ज्यादा समय हो गया लेकिन उनका काम अभी भी अधुरा है, जिसे हमें पूरा करना है और वह कार्य क्या है की हम जहाँ हैं, जैसे हैं, वहीँ कुछ श्रेष्ट कार्य करें, जिससे समाज और राष्ट्र का उत्थान हो ऐसा कार्य करें ।

 स्वामी जी ने अपने जीवन काल में जब की देश गुलाम था और समाज में  अस्प्रश्यता, जातिवाद, अन्धविश्वास,  जैसी कुरीतियाँ व्याप्त थी और राजे रजवाड़े मार काट में लगे हुए थे उस समय विवेकानंद ने कहा था कि, मैं अपनी आँखों से देख रहा हूँ के भारत वर्ष फिर से विश्वगुरु के पद पर आसीन होने जा रहा है उनकी अंतर दृष्टी कितनी सूक्षम रही होगी।

 हम परम सौभाग्यशाली है कि वर्तमान समय में हम विश्व के सबसे युवा देश है भारत की 65 % से अधिक जनसंख्या युवा है और आने वाले समय में 24 करोड़ नये युवा देश में होने वाले है । ऐसे में देश के युवाओं को सकारात्मकता का अवलंबन लेते हुए स्वयं को कठिन से कठिन परिस्थितियों से लड़ने के लिए सशक्त बनने की आवश्यकता है।

 एक प्रसंग मुझे याद आता है जिसे स्वामी जी कई बार सुनाते थे कि बनारस में स्वामी विवेकनन्द जी मां दुर्गा के मंदिर से निकल रहे थे कि तभी वहाँ मौजूद बहुत सारे बंदरों ने उन्हें घेर लिया। वे उनसे प्रसाद छिनने लगे वे उनके नज़दीक आने लगे और डराने भी लगे। स्वामी जी बहुत भयभीत हो गए और खुद को बचाने के लिए दौड़ कर भागने लगे। वह बन्दर तो मानो पीछे ही पड़ गए और वे भी उन्हें पीछे-पीछे दौड़ाने लगे। पास खड़े एक वृद्ध सन्यासी ये सब देख रहे थे, उन्होनें स्वामी जी को रोका और कहा – रुको! डरो मत, उनका सामना करो और देखो क्या होता है।

 वृद्ध सन्यासी की ये बात सुनकर स्वामी जी तुरंत पलटे और बंदरों के तरफ बढऩे लगे। उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उनके ऐसा करते ही सभी बन्दर तुरंत भाग गए। उन्होनें वृद्ध सन्यासी को इस सलाह के लिए बहुत धन्यवाद किया।

इस घटना से स्वामी जी को एक गंभीर सीख मिली और कई सालों बार कार्यक्रमों में इसका जिक्र भी किया और कहा – यदि तुम कभी किसी चीज से भयभीत हो, तो उससे भागो मत, पलटो और सामना करो।

 वाकई, यदि हम भी अपने जीवन में आयी समस्याओं का सामना करें और उससे भागें नहीं तो बहुत-सी समस्याओं का समाधान हो जायेगा! वह कहते थे- ‘मुसीबतों से भागना बंद कर दो ।’

 आज हम चाहे तो स्वामी जी के स्वप्न को सच कर सकते है भारत को विश्व गुरु के पद पर आसीन कर के बस आवश्यकता है तो संकल्प शक्ति की। स्वामी जी कहते थे कि मनुष्य के मस्तिष्क में अनेकों संभावनाएं छुपी हुई हैं लेकिन हम अपने वास्तविक योग्यताओं को समझ ही नहीं पाते और भीरुता,नकारात्मक विचारों में खोये रहते हैं।

 मुझे एक कहानी याद आ रही है “ एक शेरनी थी, वो गर्भवती थी, एक शिकारी उसके पीछे शिकार के लिए दौड़ा और उसने उस पर बाण चलाया शेरनी गिर पड़ी और उसके गर्भ से बालक बाहर निकल आया जिसका पालन  पोषण हिरनों ने अपने झुण्ड में रखकर किया वो शेरनी का बच्चा हिरनों के झुण्ड में रहता और उन्हीं के जैसा आचरण करता एक दिन एक शेर ने हिरनों के झुण्ड को देखा और वो शिकार की इच्छा से उन पर कूद पड़ा तब उसने देखा की हिरनों के झुण्ड के साथ एक शेरनी का बच्चा भी जान बचाकर भाग रहा है।

 उसने हिरनों को तो छोड़ दिया और शेरनी के बच्चे को पकड़ कर उससे पूछा कि भाई तुम क्यों डरकर भाग रहे हो । उस बच्चे ने बोला- ‘ मैं भी तो हिरन हूँ ।’ ये सुनकर शेर को आश्चर्य हुआ उसने नदी के किनारे ले जाकर उस बच्चे को उसकी सूरत दिखाई और कहा कि तू भी मेरे जैसा ही ताकतवर शेर है तू हिरन नहीं है बच्चे को भी अपना प्रतिबिम्ब देखकर अपने स्वरुप का ज्ञान हुआ और उसने दहाड़ना शुरू कर दिया प्रस्तुत कहानी आज के युवाओं की स्थिति दर्शाती है ।आज का युवा भी अपनी योग्यताओं और अपने वास्तविक स्वरुप को छोड़ कर पश्चिम की बयार में बहता जा रहा है ना उसे अपनी संस्कृति पर गर्व है न इस भरत भूमि पर।

 आज का युवा एक प्रकार के उन्माद में जीवन व्यतीत कर  रहा है आज का युवा अपने राष्ट्र और परिवार के कर्तव्यो के प्रति उदासीन हो गया है उसके चारों और एक ऐसा शोर है जो उसे कुछ और सुनने ही नहीं देता युवा अपने लक्ष्य को तभी पा सकेगा, जब वह केवल लक्ष्य के प्रति समर्पित हो जाए।

 एक बार स्वामी विवेकानंद अमेरिका में भ्रमण कर रहे थे। अचानक, एक जगह से गुजरते हुए उन्होंने पुल पर खड़े कुछ लड़कों को नदी में तैर रहे अंडे के छिलकों पर बन्दूक से निशाना लगाते देखा। किसी भी लड़के का एक भी निशाना सही नहीं लग रहा था। तब उन्होंने ने एक लड़के से बन्दूक ली और खुद निशाना लगाने लगे। उन्होंने पहला निशाना लगाया और वह बिलकुल सही लगा, फिर एक के बाद एक उन्होंने कुल 12 निशाने लगाए। सभी बिलकुल सटीक लगे। ये देख लड़के दंग रह गए और उनसे पुछा – स्वामी जी, भला आप ये कैसे कर लेते हैं ? आपने सारे निशाने बिलकुल सटीक कैसे लगा लिए?

 स्वामी विवेकनन्द जी बोले असंभव कुछ नहीं है, तुम जो भी कर रहे हो अपना पूरा दिमाग उसी एक काम में लगाओ। अगर तुम निशाना लगा रहे हो तो तम्हारा पूरा ध्यान सिर्फ़ अपने लक्ष्य पर होना चाहिए। तब तुम कभी चूकोगे नहीं। यदि तुम अपना पाठ पढ़ रहे हो तो केवल पाठ के बारे में सोचो। वर्तमान समय में आवश्यकता है कि आज का युवा अपनी योग्यताओं को पहचाने और लक्ष्य के प्रति समर्पण भाव से संकल्प ले कि वह समाज और देश हित के लिए अपने जीवन का परिष्कार करेगा तभी ये युवा दिवस मनाना सार्थक होगा । 

 पंकज कुमार शर्मा ‘प्रखर’ 

कोटा, राजस्थान

           

29 Dec 2023

कौन कहता है ..भगवान् आते नहीं

 मित्रों! प्रार्थना का बढ़ा महत्व है, किसी भी समस्या के निदान के लिए मन से की गई प्रार्थना भगवान् सारंगपाणि के सारंग से निकले अचूक बाण की तरह है जो सीधा अपने लक्ष्य अर्थात भगवान् के श्री चरणों तक पहुँचती है, फिर भगवान् भी प्रार्थी की समस्या का निदान किये बिना नहीं रह सकते। 

 लेकिन यह आवश्यकहै कि प्रार्थना केवल शब्दों का समूह न हो बल्कि उसमें हृदय की निश्छल और प्रेमाप्लावित भक्ति भी विद्यमान हो । जिस प्रकार सुगंध के बिना पुष्प अपने प्रभाव को खो देता  हैं उसी प्रकार केवल शब्द-गुच्छ ईश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते उनमें प्रार्थी की पवित्र एवं परोकार ,दया व करुणा युक्त सुगंध होना अतिआवश्यक है तभी बात बनती है।

 प्रहलाद के हरि-संकीर्तन में हृदय का भाव क्या मिला कि ईश्वर नरसिंह के रूप में प्रकट हो गये। कृष्ण के लिए गोपियों का ऐसा ही भाव रहा होगा, क्योंकि गोपी गीत केवल शब्दों तक बंधा होता तो बात नहीं बनती लेकिन जब गोपियों की विरह-वेदना गोपी गीत के साथ जुड़ी तो गोविन्द प्रकट हो गये ।प्रार्थना ज्ञान का प्रतीक है और भाव निश्चलत प्रेम का प्रतीक है । जब ये दोनों मिलते हैं तो भगवान् को आना ही पड़ता है । 

 ईश्वर को केवल सच्ची भावयुक्त प्रार्थना के द्वारा ही रिझाया जा सकता है। जब हृदय से भाव उमड़ता है तो प्रार्थना के शब्द अश्रु बनकर नेत्रों को सजल कर देते हैं इसी स्थिति में परमात्मा प्रार्थना को स्वीकार करते हैं ।  प्रकृति के कण-कण में ईश्वर विद्यमान है । उसी की सत्ता से सूर्य,चन्द्र प्रकाशवान हैं । शीतल मंद पवन प्राणवायु के रूप में जीव मात्र को पोषित कर रही है, जल शरीर में नवीन चेतना का संचार कर रहा है ।

 प्रकृति का कण-कण उसी की सत्ता से जीवंत दिखाई देता है । प्रकृति के चारों तरफ उत्सव ही उत्सव है, पक्षियों के कलरव में, पहाड़ों के सन्नाटो में, वृक्षों की  शीतल छांव में, सागरों की शांत गहराईयों में, नदियों की कल-कल में ,निर्झर की झर-झर में परमात्मा मौजूद है । यदि हम ये नहीं देख पा रहे हैं तो इसके लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं, उत्सवी प्रार्थना परमात्मा से मिलाती है, शास्त्र की बुद्धिविलासी चर्चाओं में वह नहीं  है।

 जब प्रार्थी भावविभोर होकर ईश्वर को पुकारता है तभी भगवान प्रकट होते हैं । प्रार्थना में अद्भुत शक्ति होती है, सच्चे मन से की जाने वाली प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती। ईश्वर उनकी अवश्य सुनते हैं जो उसे साफ मन से याद करते हैं, सच्चे प्रार्थी बन गये तो समझे कि भगवान तुरंत मिलने वाले हैं ।

 जब तक हृदय की वीणा परमात्मा के विरह में झंकृत नहीं होती, जब तक प्रार्थी के प्रेमाश्रु अपने प्रेमी परमात्मा के लिए नही बहते तब तक प्रार्थना मात्र एक शब्दों का समूह  भर है लेकिन जब प्रार्थी विरह-वेदना से विभूषित हो आर्तभाव से अपने प्रेमी प्रभु को पुकारता है तो ईश्वर नंगे पैर दौढ़े चले आते हैं इस परिप्रेक्ष्य में गज और ग्राह्य की कथा सर्वविदित है।

 जब तक हमारे मन में ईश्वर प्राप्ति की प्यास नहीं जागेगी तब तक परमात्मा समझ में नहीं आएगा, धर्म तर्क-वितर्क का विषय नहीं है, जैसे भोगी शरीर में उलझा रहता है वैसे बुद्धिवादी बुद्धि में उलझे रहते हैं, अंत में दोनों चूक जाते हैं, क्योंकि भगवान हृदय में है, परमात्मा इतना छोटा नहीं है कि उसे बुद्धि में बांधा जायें, उद्धव के प्रसंग में ठाकुर जी ने उस ऐश्वर्यज्ञानी को गोपांगनाओं के पास प्रेमाभाव की दीक्षा लेने के लिए भेजा है भगवान् कहते हैं “गच्छो उधौ ब्रजं सौम्य” इसलिये परमात्मा की कोई परिभाषा नहीं है।

 प्राणों से प्रेम के गीत उठते ही भगवान् प्रार्थी के पास दौड़े चले आते है, हम तो उसके पास जा भी तो नहीं सकते, क्योंकि यात्रा बहुत लंबी है और हमारे पैर बहुत छोटे हैं, बिना पता-ठिकाने के जायें भी तो कहाँ जाएं? परन्तु जब धरती भीषण गरमी में प्यास से तड़पने लगती है तभी बादल दौड़े हुए आते हैं और उसकी प्यास बुझाते हैं।

 इसी प्रकार जब भीतर विरह की अग्नि जलेगी तभी प्रभु की करुणा बरसेगी, छोटा शिशु जब पालने में रोता है तो माँ सहज ही दौड़ी चली आती है, इसी तरह सच्चे प्रार्थी के भजन में ऐसी ताकत होती है कि भगवान अपने को रोक नहीं सकते, क्योंकि सारि प्रार्थनाएँ तो तड़पते प्रार्थी के आंसुओं की ही छलकन हैं, इसलिए ‘हारिये न हिम्मत बिसारिये न प्रभु’। केवल प्रार्थना कीजिये । (सर्वाधिकार सुरक्षित)

पंकज ‘प्रखर’

लेखक एवं विचारक

सुन्दर नगर,कोटा

विद्यार्थियों पर हावी ‘प्रतियोगी परिवेश की समस्याएँ और समाधान’

 आज प्रतियोगी परिवेश विद्यार्थियों के ऊपर जिस प्रकार हावी हो गया है उससे हम सभी परिचित है । सभी विद्यार्थी अपनी अच्छी रेंक लाने के लिए दिन-रात जी तोड़ मेहनत में लगे रहते हैं । लेकिन जब उन्हें मन मुताबिक़ सफलता नहीं मिलती तो उनका मन खिन्न हो जाता है और उन्हें बरबस ही मनोरोगों (साइकोलोजिकल डिसीज़) की ओर धकेल देता है ।

ज्यादातर विद्यार्थी अधिक परिश्रम व थकावट के कारण तनाव और चिंता के शिकार हो जाते हैं, जो पढ़ाई और परीक्षाओं पर असर डालता है। इससे बचने के लिए आवश्यक है स्वस्थ जीवन शैली अपनायें व स्वस्थ मनोरंजन के लिए भी समय निकालें । इसके अलावा अध्ययन का निश्चित समय प्रबंधन भी हमारी पढाई संबंधी चिंता को दूर कर सकता है।

कई बार विद्यार्थियों का पढ़ने में मन नहीं लगता बार-बार मन यहाँ-वहाँ जाता है। जिससे पढ़ाई में एकाग्रता नहीं आती । इसके लिए हमें पर्याप्त मात्रा में हल्का भोजन तथा अच्छे पर्यावरण में बैठकर बिना किसी चिंता के पढ़ना चाहिए । हमें अपने मन को मारना या दबाना नहीं है बल्कि इसे समझाना है साथ ही मन को एकाग्र करने के लिए हो सके तो थोड़े समय उस विषय को बोल-बोलकर पढ़ना चाहिए । इस प्रकार अपनी ही आवाज़ सुनकर अपना मन कहीं और जाने की जगह अपनी ही ओर लौटने लगता है ।

 ईश्वर का सबसे महत्वपूर्ण प्रसाद है ‘आत्मविश्वास’। भगवान के इस प्रसाद को आप जितना स्वीकार करते हैं ये उतनी ही मात्रा में बड़ने लगता है । आत्मविश्वास बड़ाने का सबसे अच्छा तरीका है अपनी छोटी-छोटी उपलब्धियों का बार-बार चिंतन करें और आगे भी अच्छा करते रहने के लिए स्वयं को बार-बार बोले । जब आपके द्वारा आपकी सफलता के लिए बोले गये शब्द आपके कान में जाते हैं तो आपका आत्मविश्वास पुष्ट होता है और एक नई ऊर्जा का अनुभव होता है ऊर्जा आपको आगे बड़ाने में सहायक होती है ।

इस प्रकार छोटी-छोटी युक्तियाँ अपनाकर मन को स्वस्थ रखा जा सकता है । यहाँ हमने उन सामान्य समस्याओं  पर चिंतन किया है जो सामान्यत: हर विद्यार्थी के जीवन में कम या ज्यादा मात्रा में देखने को मिलती हैं, फिर भी यदि आपके जीवन में समस्याएं बड़ रही हैं, तो तुरंत अपने माता-पिता, शिक्षकों, मार्गदर्शकों या मनोवैज्ञानिक सलाहकारों से मदद लें क्योंकि आपका जीवन अमूल्य है और उससे बड़कर कुछ भी नहीं है ।

परीक्षाओं में सफलता के सूत्र……

 परीक्षा एक ऐसा शब्द जिसे सुनते ही बड़े से बड़े व्यक्ति के मन मैं एक अनजाना भय व्याप जाता है ।अत: आज के लेख का उद्देश्य आपको परीक्षा संबंधी ऐसे चमत्कारिक सूत्र बताना है जिनसे आप कम मेहनत और बिना किसी रटन विद्या के अच्छे अंकों के साथ पास हो सकेंगे। कुछ ही दिनों में बोर्ड की वार्षिक परीक्षाएं शुरू होने जा रही हैं मित्रों अपने इतने वर्षों के शिक्षण काल में मैंने अनुभव किया है कि छात्र अथवा छात्रा वर्ष भर कढ़ी मेहनत करते हैं और अच्छे परिणाम प्राप्त करते हैं। लेकिन जैसे ही उनकी  वार्षिक परीक्षाएं आने को होती हैं वे घबराहट और तनाव में आ जाते हैं। जिसके कारण वो विद्यार्थी जो वर्ष भर अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे। उनका वार्षिक परीक्षाओं में अध्ययन का स्तर गिरने लगता है अपनी योग्यतानुकूल परिणाम न प्राप्त कर पाने के कारण वो स्वयं को ठगा सा अनुभव करते हैं ,ये भावना उन्हें नकारात्मकता की ओर ले जाती है । किसी भी परीक्षा में सफल होने का सबसे प्रारम्भिक सूत्र है …..

आत्म–विश्वास :– आपका आत्म विश्वास ही एक मात्र ऐसा साधन है जिससे आप अपने नकारात्मक विचारों को समाप्त कर सकते है. मित्रों यदि आपने वर्ष भर पढ़ाई नहीं भी की है तब भी आपको घबराने की जरूरत नहीं है आप केवल अपने मनोबल को न गिरने दें और अभी  से पढ़ना शुरू कर दें । मैंने कुछ ऐसे छात्र भी देखे हैं जो वर्ष भर नहीं पढ़ते लेकिन परीक्षा के दिनों में उनकी सकारात्मक सोच और एकाग्रता पूर्वक कम समय में की गई पढाई उन्हें अच्छे परिणाम प्राप्त करवा देती है तो आप पूरे मनोबल के साथ आज से ही पढाई शुरू कर दें | जीवन में कुछ भी असम्भव नहीं है ये अपने मन में ठीक प्रकार से बिठा लें।

 तीक्ष्ण स्मरण शक्ति :-प्रत्येक मनुष्य की स्मरण शक्ति असीमित होती है मानव मस्तिष्क में इतनी योग्यता है की उसने सुपर कंप्यूटर तक का निर्माण कर दिया ऐसे में स्वयं की योग्यताओं को कम नहीं आंकना चाहिए । छात्रों को अपने पढ़े पाठों का रिवीजन पूरी एकाग्रता तथा मनोयोगपूर्वक करके अपनी स्मरण शक्ति को बढ़ाना चाहिए। छात्रों को अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पाठ्यक्रम को 3 से 4 बार पढ़ना कुछ भारी हो सकता है लेकिन जो लक्ष्य आपने निर्धारित किया है उसके नजदीक यह प्रयास आपको पहुँचा देगा अत: पूरे मनोयोग से पढ़े बोझ मानकर नहीं बल्कि मन से पढ़े, तो कम पढ़ने पर भी ज्यादा याद रहेगा ।

 पाठ्यक्रम को रटना नहीं समझना ज़रूरी है :– आप जिस भी विषय को पढ़ रहे है उक्त विषय से सम्बन्धित बिन्दुओं को रटने की अपेक्षा समझने का प्रयास करें क्योंकि रटने से जो भी रटा है यदि उसमे से एक भी शब्द भूल गये तो आगे का उत्तर आप नहीं लिख पायेंगे जबकि आप यदि बिंदु को समझकर लिखते है तो आप अपनी भाषा में अपने शब्दों में भी प्रश्न का उत्तर देने में सक्षम होंगे। महत्वपूर्ण विषयों या प्रश्नों की तैयारी करने की प्रवृत्ति आजकल छात्र वर्ग में देखने को मिल रही है। अगर आपका लक्ष्य 100 प्रतिशत अंक अर्जित करना है तो परीक्षा में आने वाले सम्भावित प्रश्नों के उत्तरों की तैयारी तक ही अपना अध्ययन सीमित न रखे।

 पेपर के पहले थोडा शांत रहें :- प्राय: देखा गया है की परीक्षा से लगभग 20 से 30 मिनट पहले सभी विद्यार्थी एक दुसरे से प्रश्नों या महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चाकरते नज़र आते हैं। इससे कुछ का तो आत्मविश्वास बढ़ जाता है और कुछ नकारात्मकता की ओर चले जाते हैं। उन्हें लगता है किवो अच्छे से तैयारी नहीं कर पाए हैं अत: पेपर से कुछ समय पूर्व किसी से भी कोई भी टॉपिकडिस्कस न करें अपनी तैयारी पर पूरा भरोसा करें और मन को शांत रखें ज्यादा बातें न करें और न ही ज्यादा रिविसिन करें। परीक्षा के 10 मिनट पहले पूर्ण रूप से शांत हो जाएँ।इससे आप अपने अंदर आत्मविश्वास अनुभव करेंगे फिर परीक्षा भवन में जाकर ईश्वर का नाम लें और लिखना शुरू करें।

 प्रश्न पत्र को भली–भांति समझ लें :– कुछ छात्र घबराहट के कारण प्रश्न पत्र पर दिए गये निर्देश  एवं शब्द सीमा को ध्यान से नहीं पढ़ते है जिसके फलस्वरूप वो कई प्रकार की त्रुटियाँ कर बैठते हैं छात्रों को प्रश्न पत्र हल करने के पहले उसमें दिये गये निर्देशों को भली भाँति पढ़ लेना चाहिए। ऐसी वृत्ति हमें गलतियों की संभावनाओं को कम करके परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने की सम्भावना को बढ़ा देती है. इसलिए हमें प्रश्न पत्र के हल करने के निर्देशों को एक बार ही नहीं वरन् जब तक भली प्रकार निर्देश समझ न आये तब तक बार–बार पढ़ना चाहिए।

प्रश्न-पत्र हल करने के लिए समय प्रबन्धन जरूरी :– परीक्षा में उत्तर लिखना हमेशा उन प्रश्नों से प्रारम्भ करें जिनका जवाब आप को ठीक प्रकार से आता हो इन सरल प्रश्नों को हल करने में पूरी एकाग्रता के साथ अपनी ऊर्जा को लगाना चाहिए इससे आपका मनोबल बढ़ेगा जिन प्रश्नों का जवाब कठिन लगता है या नहीं आता है उनके लिए भी नकारात्मकतानहीं आने दें अपने मन में ये भाव रखें की इन प्रश्नों का उत्तर भी आएगा क्योंकि  एकाग्रता की स्थिति में कठिन प्रश्नों के उत्तरों का आंशिक अनुमान लग जाने की सम्भावना रहती है उन्हें छोडने की भूल न करें आपकी सकारात्मक सोच से कोई न कोई रास्ता निकलेगा आप परफेक्ट उत्तर नहीं लिख पायें तो न सही लेकिन कुछ  लिखने पर कुछ अंक को मिलेंगे जब की प्रश्न छोड़ देना मूर्खतापूर्ण कार्य होगा ।

 सभी प्रश्नों को बराबर का समय दें :- प्राय: देखा जाता है कि अधिकांश छात्र अपना सारा समय उन प्रश्नों में लगा देते हैं जिनके उत्तर उन्हें अच्छी तरह से आते हैं. तथापि बाद में वे शेष प्रश्नों के लिए समय नहीं दे पाते। समय के अभाव में वे जल्दबाजी करते देखे जाते हैं और अपने अंकों को गॅवा बैठते हैं. छात्रों में कॉपी भरने की पृवृत्ति भी व्यापक रूप में देखी जाती है. विशेषकर हिंदी विषय में जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है कि कॉपी भर आने से आप पास हो जायेंगे आपको प्रश्नों का उत्तर देते समय शब्द सीमा का भी ध्यान रखना आवश्यक है अन्यथा शब्द सीमा से ज्यादा लिखना आपके लिए समय की बर्बादी हो सकता है परीक्षाओं में इस तरह की गलती करना छात्र वर्ग की सामान्य प्रवृत्ति बन गयी है जिससे बचना चाहिए एवं शब्द सीमा के अंदर ही अपने उत्तर देने चाहिए।

 सुन्दर लिखावट एवं मात्राओं का ज्ञान अनिवार्य :– अंग्रेजी में एक वाक्य आता है “फर्स्टइम्प्रैशन इस लास्टइम्प्रैशन” यदि आप परीक्षक को प्रभावित करना चाहते है तो ये आवश्यक हो जाता है की आपको लिखावट और मात्राओं का व्यवस्थित ज्ञान हो क्योंकि आपकी लिखावट परीक्षक के ऊपर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह का प्रभाव डालती है यदि आपने प्रश्नों का उत्तर सुंदर लिखावट एवं स्वच्छता के साथ लिखा गया है हालांकि  आपका उत्तर इतना सटीक नहीं है तब भी परीक्षक आपको आपकी लिखावट के आधार पर कुछ अंक दे सकते है लेकिन आपकी लिखावट सही नहीं है तो आपका उत्तर सही होते हुए भी आपको पूरे अंक मिलेंगे इसमें संदेह है. क्योंकि परीक्षक के पास अस्पष्ट लिखावट को पढ़ने का समय नहीं होता है। अत: परीक्षा में उच्च कोटि की सफलता के लिए अच्छी लिखावट एक अनिवार्य शर्त है।

 उत्तर पुस्तिका जमा करने के पूर्व :–छात्रों को उत्तर पुस्तिका जमा करने के पूर्व 10 या 15 मिनट अपने उत्तरों को भली–भांति पढ़ने के लिए बचाकर रखना चाहिए। अगर आपने प्रश्न पत्र के निर्देशों का ठीक प्रकार से पालन किया है तथा सभी खण्डों के प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दिया  हैं तो यह अच्छे अंक लाने में आपकी मदद करेगा।

प्यारे विद्यार्थियों परीक्षाएं आपके व्यक्तित्व एवं आपकी मानसिक योग्यताओं को तराशती है इससे घबराकर तनाव में नहीं आना चाहिए बल्कि एक सशक्त योद्धा की तरह तैयारी करके इसका कुशलता पुर्वक सामना करना चाहिए। परीक्षाएं जितनी कठिन होंगी आपकी मेहनत के आधार पर आपको उतने ही मीठे फल देकर जायेंगी  परीक्षा के दिनों में सकारात्मक सोच रखना बहुत ही आवश्यक होता है. अगर हम अच्छा सोचते है तो अच्छा होता है और वही बुरा सोचते है तो बुरा होता है। इसलिए पॉजिटिव सोच रखना बहुत जरुरी है। यह आपको नकारात्मक विचारों से तो बचाएगा ही साथ ही साथ आपको पढाई के तनाव से भी दूर रखेगा।

पंकज प्रखर

कोटा

पतंगे

  ‘ ज़िंदगी क्या है खुद ही समझ जाओगे , बारिशों में पतंगे उड़ाया करो। ’ ये शेर आज की परिस्थितियों में बिलकुल माकूल बैठता है ये ज़िंदगी हमें ख...